शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

नरेन्द्र मोदी विश्व पटल पर लाइव !!


दिनांक 31-08-12 को नरेन्द्र मोदी ने इन्टरनेट के माध्यम से गूगल प्लस के हैंग आउट पर जिस तरह से देश विदेश केलोगों को जवाब दिया वो अभूतपूर्व पहल है ... नयी सोच के साथ नयी पहल 

दशरथ मांझी के सपने कब पूरे होंगे...Brajesh Asopa

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पहाड़ का सीना चीर कर बीस फुट चौड़ा और आठ सौ साठ फुट लंबा रास्ता बनाने वाले दशरथ मांझी के परिवार एवं उनके गांव गहलौर की तस्वीर सरकार के लाख आश्वासनों-दावों के बावजूद आज भी वैसी है, जैसी तब थी, जब माउंटेन मै

न ने अंतिम सांस ली.
महादलितों की हमदर्द इस सरकार में कुछ नहीं बदला. न तो गांव की तस्वीर और न ही दशरथ मांझी के परिवार की क़िस्मत. सरकारी आश्वासन, घोषणा और वादे सब कुछ इस महादलित बस्ती के लिए खोखले साबित हुए हैं. माउंटेन मैन दशरथ मांझी के विकलांग पुत्र भगीरथ मांझी एवं विकलांग पुत्रवधू बसंती देवी आम महादलित परिवारों की तरह का़फी कठिनाई में छोटे से परिवार के साथ किसी तरह जीवनयापन के लिए मजबूर हैं. इस गांव में आने पर नहीं लगता है कि ह वही गांव है, जहां ’ज़दूर मंगरू मांझी एवं पतिया देवी की संतान दशरथ मांझी ने पहाड़ का सीना चीरकर इतिहास रच दिया.
दशरथ मांझी का सपना था कि जिस पहाड़ी को तोड़कर उन्होंने वजीरगंज और अतरी प्रखंड की दूरी अस्सी किलोमीटर से घटाकर चौदह किलोमीटर कर दी, उस रास्ते का सरकार पक्कीकरण कर दे.
बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित अन्य दलित और महादलित बस्तियों की तरह है, गया ज़िले के मोहड़ा प्रखंड के गहलौर गांव का महादलित टोला दशरथ नगर. सुविधाओं के नाम पर दशरथ मांझी के निधन के बाद हां एक चापाकल लगा और एक छोटे से सामुदायिक भवन का निर्माण शुरू किया गया, जिसमें सामुदायिक भवन आज भी अधूरा पड़ा है. सरकारीकर्मियों की लूटखसोट और लापरवाही का नमूना है यह गांव. नरेगा में गड़बड़ी, बीपीएल सूची अनाज वितरण में अनियमितता, प्राथमिक विद्यालय में सप्ताह में सिर्फ दो-तीन दिन ही शिक्षकों का आना, आंगनबाड़ी केंद्र का न होना आदि शिकायतें पूर्व की तरह ही विद्यमान हैं.
इसी माहौल में जी रहे हैं दशरथ मांझी के विकलांग पुत्र एवं पुत्रवधू अपनी एकमात्र संतान लक्ष्मी कुमारी के साथ. आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली लक्ष्मी ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा है. वह मेहनत-मज़दूरी कर कमाती है, तो उसके विकलांग मां-बाप को रोटी नसीब होती है. सरकारी योजनाओं के अनुसार भगीरथ मांझी को दशरथ मांझी के जीवित रहने के समय से ही विकलांग होने के कारण सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिल रही है, लेकिन उनकी विकलांग पत्नी बसंती देवी को तमाम प्रयासों के बावजूद आज तक पेंशन नहीं मिल सकी. किसी तरह इंदिरा आवास मिला, जो उनके रहने का सहारा है. दशरथ मांझी के घर के बगल में स्थित प्राथमिक विद्यालय में भगीरथ मांझी एवं उनकी पत्नी बच्चों के लिए खिचड़ी बनाने का काम कर लेते हैं, जिससे प्रतिदिन दोनों को पचास रुपये मिल जाते हैं. बसंती देवी बताती हैं कि सप्ताह में तीन दिन ही मास्टर जी आते हैं, जिसके कारण तीन दिन ही खाना बन पाता है. भगीरथ मांझी बताते हैं कि सभी सरकारी घोषणाएं हवा-हवाई हो गईं. विकलांग होने के कारण वे लोग बहुत अधिक दौड़धूप नहीं कर पाते हैं. जब कभी भी सरकारी अधिकारियों से मुलाक़ात होती है, तो वह बाबा दशरथ मांझी के अधूरे सपने को पूरा करने के सरकार के वादे के बारे में पूछते ज़रूर हैं, लेकिन उन्हें सही जवाब नहीं मिल पाता. वैसे भी सुदूर पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण कभीकभार ही सरकारी कर्मचारियों का वहां आना-जाना होता है. नतीजतन, इस गांव के खुफिया और जन वितरण प्रणाली दुकानदार मनमानी कर महादलित परिवारों के इन ग़रीबों का शोषण करने से नहीं चूकते हैं. इसी गांव में रहता है दशरथ मांझी की विधवा पुत्री लौंगी देवी का परिवार. दशरथ मांझी के घरवालों के मतदाता पहचान पत्र आज तक नहीं बन पाए हैं. जबकि प्राथमिक विद्यालय की शिक्षा समिति की सचिव बसंती देवी ही हैं. वह बताती हैं कि इस विद्यालय में डेढ़ सौ बच्चों को पढ़ाने वाले एकमात्र शिक्षक स्थानीय गहलौर के मुरली मनोहर पांडेय हैं. उन्हें 2006 से अब तक शिक्षा समिति के खाते से दो लाख से अधिक रुपये निकालकर दे चुकी हूं, लेकिन आज तक विद्यालय में विकास का कोई काम नहीं हुआ और न ही शिक्षक ने कोई हिसाब-किताब शिक्षा समिति को दिया है. वह बताती हैं कि दशरथ मांझी की पुत्री लौंगी देवी को अब तक इंदिरा आवास का दस हज़ार रुपया नहीं मिला है. इस गांव के अन्य महादलित परिवार बताते हैं कि जन वितरण प्रणाली का दुकानदार गहलौर गांव के एक संपन्न परिवार के दरवाजे पर दो-तीन महीने में एक महीने का अनाज बांटने आता है और तीन-चार महीने के कूपन ले लेता है. कुल मिलाकर दशरथ मांझी के परिवार और उनके महादलित टोले के लोग आज भी बदहाल हैं और का़फी मशक़्क़त से जीवन जी रहे हैं.
अब बात दशरथ मांझी के सपनों की. उनका सपना था कि जिस पहाड़ी को तोड़कर उन्होंने वजीरगंज और अतरी प्रखंड की दूरी अस्सी किलोमीटर से घटाकर चौदह किलोमीटर कर दी, उस रास्ते का सरकार पक्कीकरण कर दे. गांव में चिकित्सा सुविधा के लिए अस्पताल और एक अच्छे विद्यालय की व्यवस्था हो. साथ ही आरोपुर गांव में यातायात की सुविधा के लिए मुंगरा नदी पर पुल बनाया जाए. अपने इन्हीं सपनों को पूरा करने के लिए दशरथ मांझी अनेक जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाते हुए मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के हां पहुंचे थे, जहां मुख्‍यमंत्री ने अपनी कुर्सी पर बैठाकर इस महान पुरुष को सम्मान दिया था. आज दशरथ मांझी को ग़ुजरे ढाई वर्ष से अधिक हो गए, पर अभी तक कोई मुक़म्मल कार्य नहीं हुआ. अभी गहलौर घाटी से कुछ दूरी पर रइदी मांझी, सुकर दास, विश्वंभर मांझी द्वारा दी गई भूमि पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के निर्यण के लिए काम शुरू किया गया है, लेकिन घाटी की पहाड़ी पर सड़क निर्माण के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है. गांव के एकमात्र प्राथमिक विद्यालय की स्थिति का़फी खराब है. डेढ़ सौ बच्चों पर केवल एक शिक्षामित्र है. इतना ज़रूर हुआ है कि दशरथ मांझी द्वारा पहाड़ तोड़कर बनाए गए रास्ते के प्रवेश स्थल पर उनके स्मारक का काम पूरा हो चुका है. गहलौर होकर अतरी की ओर जाने वाली मुख्य सड़क में काम मंथर गति से हो रहा है. मुंगरा नदी पर पुल बनाने का काम अब तक शुरू नहीं हुआ है. इस प्रकार दशरथ मांझी के सपनों का गहलौर आज भी उपेक्षित और बदहाल है. अब दशरथ मांझी की संवेदनशीलता का भी उदाहरण देखिए, जब भारतीय स्टेट बैंक की वजीरगंज शाखा ने दशरथ मांझी को 2005 में सम्मानित करते हुए उपहार स्वरूप एक कंप्यूटर भेंट किया, तब दशरथ मांझी ने यह कहकर कंप्यूटर वापस कर दिया कि मैं इसका क्या करूंगा? इसके बदले हमारे गांव में रिंग बोरिंग करवाकर सार्वजनिक चापाकल लगवा दीजिए, जिससे लोगों और जानवरों को पेजल की सुविधा मिल सके. कंप्यूटर आज भी बैंक की शोभा बढ़ा रहा है, लेकिन बैंक ने चापाकल लगाना उचित नहीं समझा. दशरथ मांझी ने मज़दूरी करके परिवार की जीविका चलाते हुए जिस बिहारी आत्मसम्मान, कर्मठता, सहजता, विनम‘ता और गरिमा का परिचय दिया, वह किसी भी व्यक्ति के लिए अनुकरणीय है. रेल पटरी के सहारे गया से पैदल दिल्ली यात्रा कर जगजीवन राम और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने का अद्भुत कार्य भी दशरथ मांझी ने किया था. मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने उनके निधन के बाद राजकीय सम्मान देकर एक मिसाल क़ायम तो की, लेकिन बिहार की तस्वीर बदलने का दावा करने वाले मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार दशरथ मांझी के गांव गहलौर की तस्वीर बदलने में अभी तक कामयाब नहीं हो पाए.

सोमवार, 27 अगस्त 2012

कांडा का काण्ड ... सरकार का महाकाण्ड


भारतीय आकाश कितना सुरक्षित....क्या आतंकी भारतीय आकाश में घूमते रहते हैं और आतंक फैला कर गायब हो जाते हैं?

मीडिया अपने बाप कांडा के विधवा विलाप में इस कदर डूबी है की इसे और कुछ सूझ ही नहीं रहा है....वैसे इसी मीडिया ने एक खबर उड़ाई थी की अपने पुलिस से छिपने के दौरान कांडा किसी के हेलीकाप्टर से भागता रहा है और दिल्ली पुलिस उस हेलीकाप्टर वाले को पकड़ने की कवायद में जुटी है....पर एक दिन के बाद उस खबर को नहीं दिखाया गया

मैं सोच रहा था की आखिर इतनी ख़बरें मीडिया दिखा रही है लेकिन इस खबर को फिर क्यूँ नहीं दिखाया जा रहा है? क्या दिल्ली पुलिस ने हेलीकाप्टर का मसला त्याग दिया है?

पर तभी मेरे दिमाग की बिजली जली और दिमाग में एक जानकारी कौंधी की भाई उड़यन विभाग तो केंद्र सरकार के पास रहता है| अतः अगर कोई हेलीकाप्टर तो क्या किसी भी छोटे उड़यन वास्तु का प्रयोग करे तो तुरंत पता चल जायेगा....पर अगर यहाँ कांडा के हेलीकाप्टर प्रयोग का किसी को पता नहीं चला तो सीधा मतलब है की केंद्र सरकार सीधे तौर पर अपने गिरते हुए किले को बचने के लिए कांडा को निर्बाध रूप से उड़न की अनुमति दे दी लेकिन मीडिया ने एक बार उठा दिया इस बात को| अब अगर सोयी हुई जनता इस बात को पकड़ लेती तो बात बहुत बिगड़ जाती|

अब सवाल है की ऐसा क्या बात बिगड़ जाता?

अरे भाई जब एक हत्या और बलात्कार का फरार आरोपी खुलेआम भारत के आकाश में उड़ सकता है और देश की पुलिस को पता न चले तो इसका मतलब है की देश के भीतर ऐसे ही पता नहीं कितने देश विरोधी उड़ाने होती हों जिनकी जानकारी हमें होती ही नहीं है| और देश में उन देश विरोधी उड़ानों के जरिये ही आतंक फैलाया जाता हो| क्यूंकि विगत में हम पुरुलिया में विमान से अत्याधुनिक हथियार गिराए जाने की घटना को देख चुके हैं और उस घटना के मुख्य आरोपी को कांग्रेस ने ही बचाया|

जागो मित्रों...हर खबर का आंकलन करो

http://india.1hnews.com/latest/kanda-who-had-escaped-by-helicopter/

रविवार, 26 अगस्त 2012

उल्टा चोर कोतवाल को ....

पवन अवस्थी523633_337055926387137_229469282_n

जो भी भ्रष्टाचार और देश की सुरक्षा के मुद्दे पर मुहँ खोलेगा उसको बर्बाद कर दिया जाएगा .................!!!
इंटेलीजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख के खिलाफ सरकार ने शुरू की साजिश .....
IB के पूर्व चीफ अजित डोभाल पर सरकार की ख़ुफ़िया निगरानी शुरू ....

अन्ना के आंदोलन को अपने मनमाफिक मोड़ देने के बाद .. बाबा रामदेव को ट्रक भर नोटिस का पुलिंदा जारी करने के साथ अब सरकार हर उस संगठन और ब्यक्तियों के पीछे पड़ चुकी है जिस जिस ने काले घन ... घोटालों और सरकार की भ्रष्ट नीतियों के खिलाफ खिलाफत करने की कोशिस की है .. अन्ना और रामदेव के बाद सल्तनते दस जनपथिया के शागिर्दों का नया शिकार बने है देश की द्वितीय नंबर की ख़ुफ़िया एजेंसी इंटेलीजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेश अजीत डोभाल ...!
इंटेलिजेंस ब्यूरो (आइबी) अपने एक पूर्व निदेशक अजीत डोवाल और विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (वीआइएफ) पर निगाह रखने में व्यस्त है, जबकि उसे राष्ट्र-विरोधी तत्वों से संबंधित सूचनाएं एकत्र करनी चाहिए.
आइबी की रिपोर्टों के आधार पर यूपीए सरकार यह प्रचार कर रही है कि देश में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, खास तौर पर बाबा रामदेव के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के पीछे डोवाल और वीआइएफ की उनकी टीम का दिमाग है.
डोवाल वीआइएफ के निदेशक हैं और उनकी टीम में आरएसएस के कई प्रमुख विचारक शामिल हैं. अप्रैल, 2011 में फाउंडेशन ने भ्रष्टाचार एवं काले धन पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया था. संयोग से संगोष्ठी के तुरंत बाद ही अण्णा हजारे का अनशन शुरू हुआ और बाबा रामदेव ने रामलीला मैदान पर अपने 4 जून के धरने की घोषणा की.
आइबी वाले तभी से वीआइएफ पर पैनी निगाह रख रहे हैं. और इन लोगों को बखूबी पहचानने वाले डोवाल के लिए यह थोड़ी मजेदार स्थिति है.... !
अजीत डोभाल अपने समय के एक सफल और तेजतर्रार अधिकारी रहे है इन्होने पकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ प्रायोजित जेहाद पर एक पुस्तक लिखी है ""India Pakistan and The secret Jihad '' जिसका लिंक नीचे दिया हुआ है ,,,,,,,!!!
*** पवन अवस्थी ***
http://www.hindu.com/br/2008/04/29/stories/2008042950791300.htm
http://aajtak.intoday.in/story.php/content/view/706390/73
http://aajtak.intoday.in/story.php/content/view/695804/Total-integration-is-still-to-be-achieved-Ajit-Doval.html
http://www.iiss.org/about-us/intranet/training/south-asia/round-table-discussions/2006-round-table-discussions/ajit-doval/
http://www.thehindu.com/news/national/article2687373.ece?viewImage=3

बुधवार, 22 अगस्त 2012

क्या असम कश्मीर की राह पर ?

दीप मणि आज़ाद


स्वदेश चिन्तन
नरेन्द्र सहगल305086_472584496099822_1646367192_n
बंगलादेशी घुसपैठिए असम को बना रहे हैं कश्मीर
जिन जिहादी ताकतों ने निरंतर हिन्दू विरोधी हिंसक अभियान चलाकर कश्मीर को हिन्दू- विहीन करके भारत से काटने के षड्यंत्र रचे हैं, वही तत्व अब असम को भी हिन्दू-विहीन करने की खूनी मुहिम चला रहे हैं। बलात् मतान्तरण, नरसंहार, आगजनी और पलायन का जो मंजर कश्मीर घाटी में चलाया गया वही असम में दोहराया जा रहा है। असम सहित पूरे देश में बंगलादेशी घुसपैठियों की तादाद चार करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है। इन बंगलादेशी घुसपैठियों से न केवल जनसंख्या का अनुपात ही बिगड़ा है अपितु असम के कश्मीर बन जाने का खतरा भी पैदा हो गया है। जहां कश्मीर में दूसरे पाकिस्तान ने जन्म ले लिया है, वहीं असम में तीसरे पाकिस्तान की जमीन इन बंगलादेशी घुसपैठियों ने तैयार कर दी है।
असम में इस समय 38 विद्रोही गुट सक्रिय हैं। इनमें 13 गुटों पर स्थानीय और बंगलादेशी मुसलमानों का पूरा कब्जा है। मुस्लिम सिक्युरिटी काउंसिल, इस्लामिक लिबरेशन आर्मी, मुस्लिम वालंटियर फोर्स, इस्लामिक सेवक संघ, रेवोल्युशनरी मुस्लिम कमांडोज, मुस्लिम टाइगर फोर्स, यूनाइटेड रिफोरमेशन प्रोटेस्ट आफ इंडिया, हरकत उल मुजाहिद्दीन और हरकत उल जिहाद इत्यादि हथियारबंद संगठनों को पाकिस्तान और चीन से सहायता मिलती है। ये सभी संगठन बंगलादेशी मुसलमानों को सीमा पार से आने, छिपने, रहने, कारोबार करने, हिन्दुओं की जमीनों पर कब्जा करने, भारत की नागरिकता लेने और मताधिकार प्राप्त करने में मदद करते हैं।
असम के अनेक जिले मुस्लिम-बहुल हो गए हैं। यहां हिन्दुओं का जीना असंभव बन गया है। 126 विधानसभा क्षेत्रों में 56 पर बंगलादेशियों का वर्चस्व स्थापित हो गया है। पूर्वोत्तर भारत के दूरदराज के इलाकों तक इनकी बस्तियां बढ़ रही हैं। मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर और नागालैंड भी इनके शिकंजे में आने वाले हैं। राजधानी दिल्ली सहित भारत के प्राय: सभी बड़े शहरों तक इन विदेशी घुसपैठियों ने पांव पसार लिए हैं। इनका गैर कानूनी जमावड़ा, स्थानीय मुस्लिम संगठनों का सहयोग, सरकार की देशघातक राजनीति, सुरक्षा बलों को दिए जाने वाले आधे-अधूरे आदेश और हिन्दुओं की मजबूरी लाचारी ही वर्तमान त्रासदी का आधार है। बंगलादेशी मुसलमानों द्वारा किया गया यह वर्तमान शक्ति प्रदर्शन पूर्व नियोजित है। सौ से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। 500 गांवों के 5000 घर फूंक दिए गए हैं। लगभग 5 लाख लोग 200 शिविरों में पहुंच गए हैं।
सीआरपीएफ के इंटेलीजेंस सैल की रपट के अनुसार बंगलादेशियों की घुसपैठ ने असम का जनसांख्यिकी संतुलन बिगाड़ दिया है। इससे गैर-इस्लामिक धार्मिक समूहों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन असम को मुस्लिम राज्य बनाने के उद्देश्य से हिन्दुओं को पलायन कर जाने, इस्लाम कबूल करने अथवा परिणाम भुगतने की धमकियां देते हैं। इतना सब कुछ होते हुए भी सरकार खामोश है। सीमा पर घुसपैठ जारी है। पहले से आए घुसपैठियों की शिनाख्त नहीं हो रही। उन्हें वापस भेजने की कोई योजना नहीं है। सीमा को सील करने जैसा सशक्त कदम भी नहीं उठाया जा रहा

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

संसद है या तबेला !

Tanya Mishra309278_213036502157920_1172034015_n

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साम, दाम, दंड, भेद से कुर्सी पर बने रहेंगे...
शर्म का परित्याग करके नंगे होकर नाचेंगे, क्या उखाड़ लोगे.??
घपले घोटालों से तुम्हे लूटेंगे, आतंकी जीजाओं का साथ देकर तुम्हे मारेंगे, क्या बिगाड़ लोगे.??

कांग्रेस का सत्ता में बने रहने का 2014 तक का लाइसेंस है, मूर्ख भारतीयों.!!
जैसे ही राज्यसभा में कोयला आवंटन घोटाले को लेकर चर्चा शुरू हुई, वैसे कांग्रेस के सांसद और केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला सभापति के कान में जाकर ये कहकर सदन की कार्यवाही रुकवा दी कि शोरगुल होगा, इसलिये सदन को एडजर्न कर दें.
राज्यसभा में 12:45 बजे जैसे ही नए उपसभापति पी जे कुरियन कुर्सी पर पहली बार बैठने आए, राजीव शुक्ला इस अंदाज में उठे मानों उन्हें बधाई देने जा रहे हों, लेकिन उन्होने वहां जाकर कुरियन से कहा की शोरगुल होगा, पूरे दिन के लिए सदन को स्थगित कर देना.
शुक्ला का यह कहना पूरे सदन को सुनायी दे गया क्योंकि उस समय उपसभापति का माइक ऑन था. इस बात को लेकर सदन में शोर मच गया और पूरे विपक्ष ने शुक्ला को माफी मांगने को कह दिया.
विपक्ष का कहना है कि शुक्ला का यह आचरण सदन के आचरण के विपरीत है कि कोई मंत्री सभापति को जाकर कार्यवाही स्थगित करने की सलाह दे. उसके बाद सभापति ने सदन को बुधवार तक के लिए स्थगित कर दिया. गौरतलब है कि इस वक्त कोयला आवंटन घोटाले में केंद्र सरकार फंसी पड़ी है.
और भी... http://aajtak.intoday.in/story.php/content/view/705990/
'राष्ट्र सर्वप्रथम सर्वोपरि'
वन्दे मातरम्...
जय हिंद... जय भारत...

सोमवार, 20 अगस्त 2012

एक और कश्मीर !!

Suresh Chiplunkar523200_110135575800303_1427195228_n
‎1) सन 1905 में मुस्लिम लीग ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में असम को मिलाकर "बंग-ए-इस्लाम" राज्य की माँग की थी…
2) 1931 में ब्रिटिश जनगणना सुपरिन्टेण्डेण्ट ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया, कि पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में घुसपैठ कर रहे हैं…
3) 1946 में असम के दौरे पर जिन्ना ने बड़े ही विश्वासपूर्वक कहा था कि "असम जल्दी ही उनकी जेब में होगा…"
4) ज़ुल्फ़िकार भुट्टो ने अपनी पुस्तक (The Myth of Independence) में कहा है कि "सिर्फ़ कश्मीर ही हमारी आपसी समस्या नहीं है, बल्कि असम भी है…"
5) शेख मुजीबुर्रहमान ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि, "पूर्वी पाकिस्तान को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने के लिए असम को इसमें मिलाना बहुत जरूरी है…"
6) बीके नेहरू (असम के पूर्व राज्यपाल) ने अपनी पुस्तक "Nice Guys Finish Second" में कांग्रेस के तीन नेताओं देवकांत बरुआ, जिन्ना के सचिव मोईनुल हक और कैबिनेट मंत्री फ़खरुद्दीन अली अहमद (जो बाद में राष्ट्रपति भी बने) की असम और बांग्लादेश सम्बन्धी नीतियों की खासी आलोचना की है…
7) भारत की पश्चिमी कमान के जनरल जमील महमूद ने ज्योति बसु और हितेश्वर सैकिया को लिखित में चेता दिया था कि यदि समय रहते बांग्लादेशियों पर काबू नहीं पाया तो हमें अपनी सीमाएं दोबारा रेखांकित करनी पड़ेंगी…
8) इसके अलावा विभिन्न मौकों पर हितेश्वर सैकिया, ज्योति बसु, जनरल एसके सिन्हा, इंद्रजीत गुप्ता इत्यादि लोगों ने अपनी रिपोर्टों तथा विधानसभा-लोकसभा के बयानों में बांग्लादेशी मुसलमानों की विचारपूर्ण और षडयंत्रपूर्ण घुसपैठ का ज़िक्र किया है…
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इतने सारे लिखित तथ्य होने के बावजूद कांग्रेस-वामपंथी जैसी पार्टियाँ अपने वोटबैंक के लिए तथा वज़ाहत हबीबुल्ला और शबनम हाशमी जैसे कथित बुद्धिजीवी, बांग्लादेशी घुसपैठ और पाकिस्तान के रवैये को समस्या का मूल नहीं मानते हों तब तो इनसे बड़े देशद्रोही और शतुरमुर्गी कहीं और नहीं मिलने वाले…

रविवार, 19 अगस्त 2012

आवाज़ उठाने की सज़ा!

Bharat Swabhiman Trust (Official)
नोटिसों से डरने वाले नहीं हैं …
नई दिल्ली/ब्यूरो/ एजेंसी
Sunday, August 19, 2012
काले धन के मामले पर बिगुल फूंकने वाले योग गुरु स्वामी रामदेव जी पर केंद्र सरकार का शिकंजा कसता जा रहा है।
आयकर और सेवा कर विभाग की विशेष जांच के बाद अब राजस्व विभाग ने स्वामी रामदेव जी से जुड़े ट्रस्टों का अंतिम कर आकलन करना शुरू कर दिया है।
इस बीच योग गुरु ने कहा है कि वे केंद्रीय विभागों द्वारा भेजे जा रहे नोटिसों से डरने वाले नहीं हैं। उन्होंने कोई गुनाह नहीं किया है। ऐसे नोटिसों से भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका आंदोलन थमने वाला नहीं है। वित्त मंत्रालय के आयकर व सेवा कर विभागों ने हाल ही में स्वामी रामदेव जी के इन ट्रस्टों को नोटिस जारी किया था।
सेंट्रल इकोनॉमिक इंटेलिजेंस ब्यूरो (सीईआईबी) तथा सेंट्रल एक्साइज इंटेलिजेंस (डीजी सीईआई) का महानिदेशालय स्वामी रामदेव जी द्वारा संचालित इन ट्रस्टों की आयकर व सर्विस टैक्स देनदारियों की जांच पड़ताल कर रहा है।
स्वामी रामदेव जी ने कहा कि केंद्र सरकार की कई एजेंसियां पिछले करीब सवा वर्ष में उन्हें सौ से अधिक नोटिस भेज चुकी हैं। सभी नोटिसों का यथासमय जवाब दिया गया है। हाल में जो नोटिस आए हैं, उनका भी जवाब दिया जाएगा। आंदोलनों में जो भी धन खर्च होता है उसका वहन जनता करती है। स्वामी रामदेव जी के प्रवक्ता एसके तिजारावाला ने दावा किया कि ट्रस्टों को करों से छूट मिली हुई है क्योंकि ये चैरिटी के काम कर रहे हैं न कि व्यवसायिक कार्य। हम सभी जांच एजेंसियों को जांच में मदद करेंगे। हमारे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है।
(साभार:
http://www.amarujala.com/National/nat-custom-sought-details-of-the-cost-of-movement-of-Baba-Ramdev-30893.html समाचार के सम्पादित अंश| यह समाचार विभिन्न समाचार पत्रों से प्रकाशित खबरों से मात्र सूचना के उद्देश्य से लिये गये हैं)

ईद को कैसे कहूं मैं अब मुबारक ?... राजीव चतुर्वेदी

Rajiv Chaturvedi

‎"ईद को कैसे कहूं मैं अब मुबारक ?
खून जो फैला है सड़क पर वह भी तो मेरा ही है

जिस वतन में हो रहा है यह रमजान की रस्मों की तरह
उस देश का गुनाह है यह महज़
कि हज़रत मुहम्मद महफूज थे इस देश में

उस दौर में जब यजीदी कारवाँ कोहराम करता था

फातिमा के आंसुओं में अक्स है इंसानियत का
सूफियानो की यहाँ औलाद सुन लें और सोचें
कातिलों की यह कतारें कर रही अब अलविदा हैं
अलविदा नावाजों को...मुहम्मद के नवासों को ...अमन की हर रिवाजों को
और यह भी तो बताओ तुम हमें
होली और दीपावली की बधाई तुम कभी भी क्यों नहीं देते
?
और जब हमने आदाब कह कर अदब तुमको दिया

"जय राम जी की"... तुम्हारी जुबान से भी क्यों नहीं फूटा
?
यह माना कि तुम बन्दे हो खुदा के पर कभी बन्दे मातरम क्यों नहीं कहते
?
खौफ खाओ खुदा का, सूफियानो के न तुम वारिस बनो

जो मरे हैं माँ तो उनकी फातिमा भी है
जिन्दगी की इस कर्बला में तुम किधर हो
?
सूफियों के इस वतन में सूफियानो के सिपाही या यजीदी काफिले यह
?
ईद की कैसे कहूं मैं अब मुबारक
?
ईद की किसको कहूं मैं अब मुबारक
?
फातिमा मेरी थी तो सीता उसके पहले तेरी थी यह याद रख

इस धरा पर "गोधरा" तैने किया कह दे याजीदों से
तेरे पुरखे यहीं इस देश के ही थे, यहाँ के ख्वाब तेरे हैं, यहाँ की ख़ाक तेरी है
तू चूम ले इस देश की धरती को,--- यही है फ़र्ज़ अब तेरा
तुम कहो एक बार बन्दे मातरम मैं कहूंगा ईद तुमको हो मुबारक !!" -----राजीव चतुर्वेदी

 

असम के कई इलाकों में बांग्लादेशियों का कब्जा

533161_261441797306362_1857350949_n असम के हालात इस कदर भयंकर है कि दिल्ली में बैठकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता। बांग्लादेशी मुसलमानों ने बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया है। यहां से स्थानीय लोगों को भगा दिया गया है। सारी जमीन पर बांग्लादेशियों ने कब्जा कर लिया है। वोट बैंक के कारण असम सरकार की हिम्मत नहीं हो रही है कि वह कोई कार्रवाई करें। जगह -जगह पाकिस्तान और बांग्लादेश के झंडे फहरा दिए गए हैं।
हाल ही में मेरठ कॉलेज के रक्षा अध्ययन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. संजय कुमार ने असम पर शोध किया है। 2011 के जनगणनाआंकड़ों के अनुसार असम के 27 जिलों में से 11 मुस्लिमबहुल जिलों में स्थानीय मूल के लोग अल्पसंख्यक बन गए हैं। असम में 1955 में 95 प्रतिशत क्षेत्रीयलोग थे। 1971 में ये घटकर आधे रह गए। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद अब क्षेत्रीय लोगों की संख्या महज करीब 36 फीसदी रह गई है।
डा. संजय कुमार के मुताबिक असम में 64 फीसदी बाहरी लोग हैं, जिनमें सबसे ज्यादा बांग्लादेशी हैं। आर्थिक विकास न होने और राजनीतिक उदासीनता की वजह से यह हालात हुए हैं। कुछ साल पहले सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को स्थानीय नागरिक बनाने के लिए कानून बदल दिया। चूंकि वे कांग्रेस के वोटर थे। यहींसे असम के हालात और बिगड़ने शुरू हुए। बांग्लादेशियों को लगा कि वोट बैंक के जरिए वह भी कुछ कर सकते हैं। वोट बैंक के कारण कांग्रेस सरकार उनका ही समर्थन करेगी। इसका सबसे भयावह नतीजा .यह है कि असम के सीमा वालेइलाके में बांग्लादेशी मुसलमानो में आबादी बढ़ाने की होड़ मची हुई है। एक -एक आदमी के चार-चार बीबियां और 50-50 बच्चेहैं। ये इन्हें वोटर के रूप में पैदा कर रहे हैं।
इन इलाकों का दौरा कर लौटे कुछ पत्रकारों ने कहा कि यहां के हालात का सही वर्णन करना मुमकिन नहीं हैं। बस यो समझ लीजिए कि कछार समेत कई इलाके तो भारत के हाथ से निकल चुके है। यह पूरी तरह से बांग्लादेश हो चुका है। स्थानीय लोगों को बांग्लादेशियों ने भगा दिया है।स्थानीय लोगों के गांव वीरान हो गए हैं। उनकी हिम्मत नहीं हो रहीहै कि वे अपने घर लौट सकें। सेना की मदद से भले ही वे लौट जाएं लेकिन देर-सबेर उन्हें बांग्लादेशी फिर खदेड़ देंगे। कई जगह बांग्लादेश और पाकिस्तानके झंडे लगा दिए गए हैं। असम को बांग्लादेश बनाने का काम कई दशक से चल रहा है।
बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियां अनुसूचित जाति एवं अन्य हिंदुओं के खेत, घर और गांवों पर कब्जा करके हिंदुओं को भगाने में लगे हुए थे। कारबी, आंगलौंग, खासी, जयंतिया, बोडो, दिमासा एवं 50 से ज्यादा जनजातिके खेत, घर और जीवन पर निरंतर हमलों से खतरा खड़ा हो गया हैं। इनकी जमीन पर बांग्लादेशियों नेकब्जा जमा लिया है। अब हालात विस्फोटक हो गए हैं। सबसे हैरत की बात यह है कि यहां के घुसपैठिए बांग्लादेशी गर्व से कह रहे हैं कि सिलहट. कछार समेत कई इलाके तो जबरन भारत को दे दिए गए थे, ये तो पाकिस्तान के हिस्सा थे। जो अब बांग्लादेश को मिलना चाहिए। जगह-जगह बेहद आपत्तिजनक पोस्टर लगाए गए हैं

शनिवार, 18 अगस्त 2012

इक्कीसवीं सदी का सच

मानवता की सबसे बड़ी त्रासदी226343_196972007101118_1064325031_n
भारत के अधिकांश घरों में बिना हल्दी के खाना नहीं पकता, लेकिन इस देश की कुछ औरतें ऐसी भी हैं जिन्हें हल्दी के रंग से ही नफरत है। बिना दाल के भोजन अधूरा है, लेकिन कुछ महिलाओं को पीले रंग की दाल देखते ही मितली आने

लगती है। लंबे, घने केश औरतों के सौंदर्य के आभूषण माने जाते हैं, लेकिन कुछ औरतों को अपने लंबे, घने बालों से भी घिन आती है। इन विचित्र औरतों से हमारा परिचय हाल ही में आई एक पुस्तक अदृश्य भारत में होता है।
ये महिलाएं हमारे मल के साथ ही हमारी इंसानियत को टोकरियों में भरकर अपने सिर के ऊपर रखती हैं। उन टोकरियों में भरा मैला उनके जेहन पर इस कदर तारी हो गया है कि खुद से और इंसानियत से घिन आने लगी है। इसीलिए हल्दी देखकर वे गश खा जाती हैं, पीली दाल देखकर उन्हें मितली आने लगती है और अपने घने, काले बालों से वे इसलिए घृणा करती हैं, क्योंकि उनमें समा गए हमारे मल की दुर्गध कभी कम होती ही नहीं। इन औरतों के लिए दुनिया की बहुत-सी खूबसूरत चीजें बदसूरत बन चुकी हैं जैसे बारिश। इन औरतों के लिए बरसात का मतलब है टपकती हुईं टोकरियां, जिनके बजबजाते मल से उनका शरीर, उनका मन और उनकी आत्मा सब भर जाते हैं।
ये औरतें हर शहर, कस्बे और गांव में सिर पर मैला ढोने का तो काम करती ही हैं, साथ ही रेलगाडि़यों से गिरने वाले मल को रेलवे लाइन से उठाती भी हैं। और हम हैं कि उनकी ओर देखना भी नहीं चाहते। शायद इसलिए कि उन्हें देख लेंगे तो हमें इस बात का अहसास हो जाएगा कि उनकी टोकरी में हमारे मल के साथ-साथ हमारी इंसानियत भी लिपटी हुई है। अगर ऐसा न होता तो क्या मजाल है कि वह टोकरी 2012 में भी उनके सिर पर टिकी होती।
पूरी दुनिया में पुराने जमाने के शुष्क (बिना फ्लश के) शौचालय या तो खत्म कर दिए गए हैं या फिर खत्म किए जा रहे हैं। कहीं भी रेलवे लाइन के ऊपर रेलगाडि़यों से गिरता हुआ मैला अब नजर नहीं आता, लेकिन हमारे देश में शुष्क शौचालयों की भरमार है और हमारी रेलवे लाइन ही नहीं, बल्कि तमाम सड़कें, गलियां और नालियां खुला शौचालय बनी हुई हैं।
संतोष की बात यह है कि इस पद्धति को समाप्त करने की आवाजें भी उठती रही हैं। सफाई कर्मचारियों के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया है। आयोग की सिफारिशें तो अलमारियों में दीमक के हवाले कर दी गईं, लेकिन आवाजें बंद नहीं हुईं। देश के कई भागों में सफाई कर्मचारियों ने आंदोलन छेड़ दिए। इसका नतीजा हुआ कि 1993 में मैला ढोने वालों को काम पर रखने और शुष्क शौचालयों का निर्माण निषेध करने वाला अधिनियम पारित किया गया। इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को मानव-मल ढोने के काम पर लगाया जाना गैर-कानूनी है। शुष्क शौचालयों के निर्माण व प्रबंध पर रोक लगा दी गई है। साथ ही मैला ढोने के काम में लगे लोगों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था करने का प्रावधान है, लेकिन यह कानून फाइलों में कैद होकर रह गया। जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया।
इस संबंध में अपील दायर करने पर जब सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों से जानकारी मांगी कि कानून का क्रियान्यवन किस हद तक किया गया है तो सब राज्यों का जवाब था कि मल ढोने वाला कोई कर्मचारी नहीं है और तमाम शुष्क शौचालयों को जल-चालित बना दिया गया है।

कोर्ट के सामने मल ढोने वाली महिलाओं को खड़ा करके इन झूठे बयानों का पर्दाफाश किया गया, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय भी असहाय नजर आया। किसी भी अधिकारी को इस बात के लिए दंडित नहीं किया गया कि उसने कानून का पालन नहीं किया है। कानून लागू करने में सरकार की ढिलाई ने सफाई कर्मियों के संगठनों को आक्रोशित कर दिया। मैला ढोने वालों ने विभिन्न शहरों में अपनी टोकरियों में आग लगा दी और बहुत से शुष्क शौचालयों को ध्वस्त कर दिया।


images1 सर्वोच्च न्यायालय के सामने दिए गए सरकारी हलफनामों की सच्चाई को परखने के लिए अदृश्य भारत की लेखिका भारत भ्रमण पर निकलीं। उन्होंने पाया कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक इस कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। दिल्ली के नंदनगरी की मीना ने बताया कि मैला ढोने के कारण गर्भ में उनकी बेटी को संक्रमण हो गया। यह लड़की विकलांग पैदा हुई। इसके बाद से मीना ने मैला ढोने से तौबा कर ली और मैला ढोने के खिलाफ चलने वाले अभियान से जुड़ गईं। झूठ को सच मे तब्दील करने की कला का नमूना बिहार की राजधानी पटना की यात्रा के दौरान देखने को मिला। शहर की अनेक कॉलोनियों में टॉयलेट में फ्लश तो लगे हैं, किंतु मैला निकालने के लिए कोई सीवर लाइन नहीं है। जिस टैंक से पूरे इलाके के ये फ्लश टॉयलेट जुडे़ हुए हैं, उसकी सफाई दिन में नहीं, रात में होती है ताकि उस घिनौने दृश्य को देखने की तकलीफ वहां रहने वाले सभ्य लोगों को उठानी न पडे़।


सिर पर मैला ढोने वाले सबसे अधिक व्यक्ति उत्तर प्रदेश में हैं। एक लाख से अधिक ये लोग रोजाना नर्क भोगते हैं। यूपी के सबसे बड़े शहर कानपुर के तमाम पुराने मोहल्लों में औरतें ही मल साफ करती हैं। यह तब है जब राष्ट्रीय सफाई आयोग के अध्यक्ष रहे पन्नालाल तांबे इसी शहर के रहने वाले हैं। पन्नालाल कहते हैं कि जब हम गंदगी को खत्म कर सकते हैं, शुष्क शौचालय खत्म कर सकते हैं तो सरकार क्यों नहीं कर सकती? लेखिका जब अपनी यात्रा के दौरान आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले की नारायण अम्मा से मिलीं तो उनके बालों में फूलों का गजरा सजा था। उन्होंने कहा कि मैला ढोने का काम छोड़ने के बाद ही मुझे खुद के इंसान होने पर विश्वास हुआ। मैंने इस खुशी के लिए लंबा संघर्ष चलाकर नर्क से मुक्ति हासिल की है। हम सबकी मुक्ति भी नारायण अम्मा जैसी औरतों की मुक्ति के साथ जुड़ी हुई है। (लेखिका लोकसभा की पूर्व सदस्य हैं)

 

कौन हैं ये दहशतगर्द ?

Arvind Jadoun

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भारत में नफरत-दहशत के पीछे आईएसआई, पाकिस्‍तान से फैलाए गए एसएमएस........

कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में हाल ही में पूर्वोत्तर के लोगों को आए आपत्तिजनक एसएमएस-एमएमएस के पीछे पाकिस्तान के उपद्रवी तत्वों का हाथ पाया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की जांच में सामने आया है कि करीब 100 ऐसी वेबसाइटें हैं जिन पर भारत में हिंसा भड़काने वाली फोटो और संदेश लिखे हुए हैं। इस बीच शनिवार को इलाहाबाद मे
लगाया गया कर्फ्यू भी हटा दिया गया। सीबीआई ने असम हिंसा की जानकारी देने वाले को एक लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा की है।
केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने शनिवार देर शाम कहा कि मंत्रालय ने इन संदेशों और फोटो के अपलोड होने का स्थान पता लगाने के लिए दो टीमों का गठन किया था। इन टीमों ने पाया है कि ये सभी पाकिस्तान से किए जा रहे हैं। सिंह ने कहा कि इनमें से 76 वेबसाइटों को ब्लाक कर दिया गया है जबकि 34 अन्य को ब्लाक करने की कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा, 'जिन तस्वीरों को अपलोड किया गया है, उनमें से कुछ म्यांमार की पुरानी हिंसक घटनाओं की तस्वीरें हैं। इन्हें जानबूझकर भारत में हिंसा फैलाने और सांप्रदायिक सद्भाव बिगाडऩे के लिए अपलोड किया गया है। यह बेहद आपत्तिजनक है और हम इसे सार्वजनिक इसलिए कर रहे हैं कि दुनिया को पता लगे कि पाकिस्तान के शरारती तत्व किस तरह का काम कर रहे हैं।' गृह मंत्रालय इस मामले को विदेश मंत्रालय के जरिए पाक के समक्ष उठाएगा। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा 7 सितंबर से अपनी तीन दिवसीय पाकिस्तान यात्रा के दौरान दहशत भरे एसएमएस के पीछे वहां के शरारती तत्वों के हाथ का मामला उठाएंगे। इस बारे में पड़ोसी देश से लिखित में आपत्ति भी दर्ज कराई जाएगी और वे दस्तावेज भी सौंपे जाएंगे जिनसे यह प्रमाणित होगा कि जिन संदेशों और तस्वीरों से भारत में दहशत फैली है, वह पाकिस्तान से अपलोड किए गए हैं। केंद्रीय गृहसचिव आरके सिंह ने 'भास्कर' से कहा, 'यह संवेदनशील मामला है। इसलिए हमने लिखित में ही आपत्ति दर्ज कराने का निश्चय किया है। अगर जरूरत समझी गई तो पाक गृह सचिव से बातचीत से भी गुरेज नहीं करेंगे।'
उधर, सूत्रों के मुताबिक इस मामले में गृह मंत्रालय ने विदेश मंत्रालय को आईएसआई का हाथ होने के भी साक्ष्य दिए हैं। विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि विदेश मंत्री की यात्रा के दौरान पाक को सभी संबंधित साक्ष्य दिए जाएंगे। उससे कहा जाएगा कि वह इन मामलों के पीछे मौजूद लोगों को गिरफ्तार कर उन्हें सजा दे। पड़ोसी देश से यह भी कहा जाएगा कि द्विपक्षीय संबंधों में जिन बातों से दरार आती है, उसे रोकने के लिए वह समुचित कदम उठाए। इस बीच, दक्षिण भारत से शुरू हुए ये एसएमएस शनिवार को राजधानी दिल्ली पहुंच गए। लेकिन पुलिस ने उत्तर पूर्व के लोगों को पूरी सुरक्षा देने का वादा किया है। दिल्‍ली पुलिस ने ऐसे सभी एसएमएस को केवल अफवाह बताया है। संयुक्त पुलिस आयुक्त रॉबिन हीबू ने कहा, 'उत्तर पूर्व के लोगों के खिलाफ झूठे एसएमएस भेजे जा रहे हैं। खासकर जिनमें हमले की धमकी दी जा रही है। उधर, अफवाहों के चौथे दिन भी बेंगलुरु से पलायन जारी रहा। वहीं पिछले चार दिनों से दक्षिण भारतीय राज्यों में उत्तर पूर्व के लोगों के खिलाफ दहशत भरे एसएमएस भेजे जा रहे हैं।
यूपी पहुंची असम हिंसा के विरोध की आगअसम में और हिंसा, कर्नाटक में अफवाह फैलाने के आरोप में कई गिरफ्तार किए जा चुके हैं॥ और कुछ की तलाश है

क्या वास्तव मे अंतिम विकल्प नरेंद्र मोदी?

Dk Singh

अनुक्रमणिका

Why can't other CMs learn from Narendra Modi and act responsibly?
नोएडा के छह सौ उद्यमी गुजरात जाने को तैयार
ठ्ठ जागरण संवाददाता, नोएडा नोएडा के उद्यमी यहां के हालात से इस कदर दुखी हैं कि उन्हें भविष्य में भी उम्मीद की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही। छह हजार उद्यमियों का नेतृत्व कर रही नोएडा एंटरप्रिनियोर्स एसोसिएशन ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मेहसाणा में औद्योगिक भूखंड उपलब्ध images1
कराने की मांग की है। उद्यमियों ने दावा किया है कि भूखंड मिलने के बाद वे सभी औपचारिकताओं को पूरी कर दो वर्ष में कारखाना शुरू कर देंगे। करीब 36 साल पूर्व जब नवीन ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण (नोएडा) की स्थापना की गई थी, उस समय यहां औद्योगिक शहर को नया आयाम देने की बात हुई थी। अथॉरिटी के वादों और दावों के विपरीत नए उद्योग लगाने के लिए पिछले करीब चार-पांच वर्षो से कोई स्कीम नहीं निकाली गई। महंगी जमीन, महंगी बिजली, बढ़े हुए टैक्स और खराब कानून व्यवस्था के चलते उद्यमी अब यहां से बाहर जाना ही बेहतर मान रहे हैं। कौन से उद्योग कर चुके हैं पलायन : नोएडा से अब तक पोलर इंडस्ट्री, कैंट आरओ, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद बनाने वाली करीब डेढ़ सौ कंपनी, तीन दर्जन से अधिक दवा कंपनी, दो दर्जन हथकरघा उद्योग, म्यूजिक सिस्टम बनाने वाली आधा दर्जन कंपनी। ये उद्योग पलायन करने की तैयारी में : मदरसन, मिंडा ग्रुप, एलजी व सैमसंग ग्रुप, होंडा सीएल आदि।

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मौसेरे भाई !!

Mahendra Singh shared Pankaj Om Satya's photo.

कॉमनवेल्थ गेम्स में हुई गड़बडियों के मामले की जांच कर रही सीबीआई अब कांग्रेस सांसद सुरेश कलमाड़ी को बचाने में जुट गई है।
सीबीआई ने विशेष अदालत में 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े क्वीन बैटन रिले आयोजन में कोष की कथित अनियमितता के मामले में शुक्रवार को आरोप पत्र दाखिल किया है। सीबीआई की इस चार्जशीट में खास बात यह है कि इसमें कलमाड़ी का नाम नहीं है। सीबीआई का कहना है कि घोटाले में कलमाड़ी के सीधे शामिल होने के कोई सबूत नहीं है।
सीबीआई ने आयोजन समिति के अधिकारी टी.एस. दरबारी, संजय मोहिंद्रू, जयचंद्रन ओर लंदन के व्यापारी आशीष पटेल को नामजद किया है। एजेंसी ने आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधी कानून के अलावा भारतीय दंड संहिता की फर्जीवाड़े और धोखाधड़ी संबंधी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है।

घोटालों के सरदार -2

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Suresh Chiplunkar

कम से कम अब कोई मनमोहन सिंह पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का एजेण्ट होने का आरोप नहीं लगा सकता, क्योंकि उन्होंने खालिस देसी कम्पनियों को देश का कोयला लूटने का पूरा मौका दिया है… :P
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कपिल सिब्बल की "जीरो लॉस" वाली थ्योरी के समर्थक, एक और "बुद्धिमान" मंत्री सामने आए हैं श्रीप्रकाश जायसवाल… जनाब फ़रमाते है

ं कि "सरकार को कोयला खदानों में कोई राजस्व नुकसान नहीं हुआ है, क्योंकि जिन 57 कोल ब्लॉक "रेवड़ी" की तरह बाँटा गया था, उसमें से सिर्फ़ एक में ही उत्पादन शुरु हुआ है… यानी वे कहना चाहते हैं कि हमने तो लूटने के 57 ठिकाने दिए थे, लूट सिर्फ़ एक में ही हो पाई…
और हाँ… खबरदार!!! सरकार का जो रवैया पिछले 8 साल से है, वही आज भी है… जी हाँ, सही समझे आप, "तुमसे जो बन पड़े सो उखाड़ लो, हम तो लूटेंगे…"

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Mukul Shrivastava

विद्वान् और इमानदार प्रधानमंत्री की सच्चाई आज सब के सामने आ ही गई....पहले बोला जा रहा था की ये CAG की फाइनल रिपोर्ट नहीं है...
सीएजी ने आज कोयला ब्लॉक आवंटन रिपोर्ट शुक्रवार को राज्यसभा में पेश कर दी गईं।कोयला ब्लॉक आवंटन मे 1.86 लाख करोड़ के घोटाले का आरोप है। सरकार ने 2004 से 2009 के बीच लगभग 100 कंपनियों को जिन में कई गुटखा बनाने वाली कम्पनी भी हैं, 155 कोयला खदानों का आवंटन किया गया। इससे सरकारी खजाने को लगभग 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। ये 1.76 लाख करोड़ के टेलीकॉम घोटाले से ज्यादा बड़ी रकम है 2004-06 के बीच 142 कोल ब्लॉक बांटे गए। इस दौरान कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास था...इन का क्या कर लेंगे हम सब सड़कों पे तिरंगा हाथ में ले के...???

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अजय कुमार झा

पिछले कुछ दशकों में देश में पकडे जाने वाले घोटालों की राशि को देखकर कोई भी नहीं कह सकता ये कि किसी गरीब देश में होने वाले घोटालों का धन है , तो अब ये बिल्कुल साफ़ हो चुका है कि देश में धन और संसाधन दोनों ही ,अंग्रेजों और बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा लगातार नोचे खसोटे जाने के बावजूद अब भी इतना बचा हुआ तो जरूर है कि देश का एक एक इंसान , रोटी कपडा और मकान के हक को पूरे हक के साथ सरकार को सुनिश्चित कराने के लिए कह सके । और इसके बावजूद भी सरकार प्रशासन के पास . अब अवाम से कोई भी कर लिए जाने लायक , मुंह नहीं बचा है ..बांकी कुछ और दिखा के मांगना चाहें तो और बात है ..अरे महाराज......माने कि "हाथ " फ़ैला कर ।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

यक्ष प्रश्न

Sadhak-badhak Pawan

संघ ,विश्व हिन्दू परिषद ,बजरंग दल विद्यार्थी परिषद् व भाजपा के कार्यकर्ताओ से
बोफोर्स प्रकरण चल रहा था राजीव [रोबोर्ट] गाँधी जब देश की हिन्दू सस्थाए विशेष कर राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ के नेतृत्व में विश्व हिन्दू परिषद ,बजरंग दल आदि व हिन्दू महासभा के नेतृत्व में आदि संगठनो हिन्दुस्थान श्रमिक सेना, हिन्दू युवक सभा,हिन्दू महिला सभा, हिन्दू राष्ट्र सेना, हिन्दू विद्यार्थी सभा,जात पात
तोड़क सम्मलेन, हिन्दू अधिवक्ता सभा ,हिन्दू किसान सभा,हिन्दू सेवा दल आदि संगठनो व शिव सेना व अन्य हिन्दू संगठनो ने भी रामजन्म भूमि आन्दोलन चला राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ , विश्व हिन्दू परिषद ,बजरंग दल विद्यार्थी परिषद् आदि ने चुनावो में हिन्दू का झूठा भोजन करने वाली भाजपा [भारतीय जिन्ना पार्टी ] जो गाँधीवादी व धर्म निरपेक्ष है को समर्थन दिया और हिन्दू महासभा जो डॉ. हेडगेवार ,वीर सावरकर ,भाई परमानद ,लाला हरदयाल ,राष बिहारी बोस ,saradar अजीत shing ,आशुतोष लाहिरी ,अरविंद घोष,डॉ. मुंजे के स्वपनों का भारत को हिन्दू रास्ट्र बना सके यह कार्य जिसका विरोध किया परिणाम स्वरूप हिन्दू का झूठा भोजन करने वाली भाजपा [भारतीय जिन्ना पार्टी ] के ९० के लगभग संसद जीत कर आये हिन्दू का झूठा भोजन करने वाली भाजपा [भारतीय जिन्ना पार्टी ] ने विश्व नाथ प्रताप सिंह को प्रधान मंत्री बनवाया विश्व नाथ प्रताप सिंह ने जामा मस्जिद के इमाम बुखारी की सिफारिस पर देश का पहला गृह मंत्री मुसलमान बनाया वो भी देश द्रोही मुसलमान मुफ्ती मोहम्मद सईद को देश का पहला गृह मंत्री बना यानि सीधे -सीधे तोर पर कह सकते है देश द्रोही मुसलमान मुफ्ती मोहम्मद सईद को देश का पहला गृह मंत्री बना वो राम जन्म भूमि के वोट बेंक के बल पर राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ के नेतृत्व में विश्व हिन्दू परिषद ,बजरंग दल हिन्दू का झूठा भोजन करने वाली भाजपा [भारतीय जिन्ना पार्टी ] के सहयोग से जबकि कांग्रेस व जनता पार्टी ने भी कभी देश का पहला गृह मंत्री मुसलमान को नहीं बनाया राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ , विश्व हिन्दू परिषद ,बजरंग दल विद्यार्थी परिषद् के कार्य कर्त्ता बत्ताए की यह हिन्दू के साथ धोख नहीं है तो क्या है हिन्दू तो खतरे में है हिन्दू को बचाना है तो नए विकल्प हिन्दू महासभा के साथ मिलकर काम करना padega डॉ पवन कुमार सुरोलिया प्रदेश अध्यक्ष राजस्थान प्रदेश हिन्दू महासभा प्रदेशप्रभारी गुजरात व हिमाचल हिन्दू महासभा
मो 9829567063

सोचिए ज़रा !

प्रबुद्ध कुमार भारतीय580096_394577910608410_761087855_n
देश के ६६ वे स्वतंत्रता दिवस एवं ६५ वी वर्षगाँठ को धरती से लेकर अन्तरिक्ष तक सभी ने सर्वत्र बड़े धूम धाम से मनाया .....इस दौरान बहुत कुछ सुना, लिखा और देखा गया ...! लालकिले की प्राचीर से भी देश की तमाम बीमारियाँ गिनाई गयीं लेकिन उनकी दवा और इलाज के तरीके पर चुप्पी छाई रही .....इन सबके बीच देश के आर्थिक विकास में वृद्धि कैसे हो इस को लेकर चिंता जरुर व्यक्त की गयी, क्यों न हो आखिर कभी सात समंदर पार अमेरिका से बराक ओबामा गरियाते हैं तो कभी देश के अन्दर ही रतन टाटा जैसे उद्धयोगपति आर्थिक विकास में वृद्धि के उपाय लागू करने के वादों को पूरा करने का दबाव बनाते हैं ...! ऐसा नहीं है कि पिछले ६५ वर्षों में कोई आर्थिक विकास नहीं हुआ हो... वास्तव में आर्थिक विकास तो हुआ है लेकिन देश की आम जनता का नहीं बल्कि १० से २० प्रतिशत उद्धयोगपतियों का, सत्तासीन राजनेताओं का और माफियाओं का ...!
जरा सोचिये कि
योजना आयोग गरीबी की नयी-नयी परिभाषाएं गढ़ रहा है ....३२ रुपये रोज कमाने वाला गरीब नहीं माना जायेगा......यह कैसा आर्थिक विकास है...? यह समझ से परे है, क्योंकि घर में खाने को दो वक़्त की रोटी भले न जुटाई जा सके लेकिन हर हाथ में मोबाईल देने की बात की जाती है .....! पिछले ६५ वर्षों में इस आर्थिक विकास में हम अभी तक देश के पूरे लोगों को बुनियादी सुविधाए ....बिजली ,पानी, मकान और सड़क तक उपलब्ध नहीं करा सके हैं.....हमारे किसान आत्महत्या कर रहे हैं .....शिक्षा, बेरोजगारों की संख्या बढ़ा रही है ....जो पहले गरीब थे वे आज और गरीब तथा अमीर और अमीर होते जा रहे हैं......यह खाई और अधिक बढ़ती जा रही है.....तो ऐसे आर्थिक विकास में वृद्धि करने से आखिर क्या लाभ ...और किसको लाभ होगा ....?
वास्तव में आर्थिक विकास को नापने के लिए हम औद्योगिक कम्पनियों के तिमाही नतीजों और सूचकांक से इस आर्थिक विकास को परखते हैं.....जबकि देखना यह चाहिए कि १९४७ की तुलना में आज देश की आम जनता की वास्तविक क्रय शक्ति कितनी बढ़ी है......? जब तक देश के आम गरीब इंसान की क्रय शक्ति नहीं बढती....तब तक सही मायने में देश का आर्थिक विकास सिर्फ छलावा ही रहेगा......!

घोटालों के सरदार !

Jitendra Gupta

नई दिल्‍ली. संसद में शुक्रवार को सीएजी की रिपोर्ट रखे जाने के साथ ही सियासी पारा तेज हो गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कोयले खदानों की नीलामी में सही प्रक्रिया नहीं अपनाए जाने से सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। बीजेपी सहित विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (जो उस दौरान कोयला मंत्रालय भी देखा करते थे) समेत यूपीए सरकार पर हमला बोल दिया है। लेकिन सरकार ने रिपोर्ट को हल्‍के में लिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री वी. नारायणसामी ने कहा है कि यह शुरुआती रिपोर्ट है और इसे पेश करने में भी सीएजी ने संवैधानिक प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया है।

 

ये कौन हैं जो देश को अस्थिर करना चाहते हैं !!

"पाकिस्तान में औसतन प्रति दिन ४० मुसलमान इस्लामिक आतंकवाद की घटनाओं में मारे जाते हैं पर इससे मुसलमान आंदोलित नहीं होते. अफगानिस्तान में औसतन प्रतिदिन २८ मुसलमान इस्लामिक आतंकवाद में मारे जाते हैं इस पर मुसलमान नहीं भड़कते. भारत में हुई आतंकवाद की घटनाओं पर कभी कोई किसी भी प्रकार का मुसलमान खेद व्यक्त करता हो या आतंकवाद की घटना की निंदा करता हो तो बताओ ? लेकिन म्यांमार की घटना का मुम्बई, लखनऊ, कानपुर,इलाहाबाद में हिंसा और तोड़ फोड़ हो रही है. कुल मिला कर बात यह कि मुसलमान आतंकवादी या दंगाई जब तक किसी दूसरे को मारते हैं तब तक शातिराना चुप्पी है और जब मारे जाते हैं तो छाती पीटी जाती है. भारत में इस्लामिक आतंकवाद से प्रति वर्ष इतने लोग मरते हैं कि जितने किसी भी युद्ध में नहीं मरे पर उसकी निंदा करता या सांत्वना देता कोई बयान कहीं नहीं सुनाई पड़ता,--- तब कहाँ चले जाते हैं मुल्क के तरक्की पसंद,
अमन पसंद मुसलमान ? है कोई अमन पसंद मुसलमान ? है कोई राष्ट्र प्रेमी मुसलमान ? ---तो बोलते क्यों नहीं ? अगर ऐसे में भी अमन पसंद मुसलमानों की चुप्पी रही तो मुल्क तो यह मान ही लेगा कि मुसलमान केवल साम्प्रदायिक ही नहीं हैं बल्कि दहशतगर्द दंगाईयों के साथ हैं और भारत राष्ट्र को तोड़ने की साजिश में मूक या मुखर हो कर शामिल हैं. कश्मीर के विस्थापित पंडितों के लिए कभी किसी मुसलमान ने आवाज़ उठाई हो तो बताओ ? औरंगजेब के द्वारा हिन्दू मूर्ति / मंदिर तोड़ना जायज था, लखनऊ में अलविदा की नवाज़ के बाद बुद्धा पार्क में भगवान् बुद्ध की और महावीर भगवान् की मूर्ति तोड़ना जायज है, बामियान में तालिबान द्वारा बुध प्रतिमाएं तोड़ना जायज है तो फिर बाबरी मस्जिद तोड़ा जाना क्यों नाजायज है ? जम्मू -कश्मीर में इस्लामिक आतंकवादीयों ने दर्जनों मंदिर जला डाले कहीं से किसी मुसलमान के मुंह से साम्प्रदायिक सौहार्द के स्वर नहीं फूटे,--क्यों ? लेकिन बाबरी मस्जिद के लिए श्यापा आज तक जारी है जबकि उसी दौर में हजरत मुहम्मद साहब की बनवाई हुई मस्जिद चरार -ए-शरीफ को इस्लामिक आतंकवादी मस्तगुल ने जला कर राख कर दिया तो कोई बात नहीं. कुल मिला कर अगर मामला इस्लामिक आतंकवाद का है तो मुसलमान उसकी मुखर या मूक पक्षधरता करते हैं और जब कहीं मारे जाते हैं तो श्यापा करते हैं. माना कि शारीरिक खतना मुसलमानों की साम्प्रदायिक शिनाख्त है पर यह न्यायिक दृष्टिकोण का यह खतना तो खलिश पैदा कर रहा है."---- राजीव चतुर्वेदी

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

हिन्दुओ कि आजादी का सच और महात्मा गाँधी .......

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Raju Ramnaresh Kewat

हिन्दुओ कि आजादी का सच और महात्मा गाँधी .......
पाकिस्तान से दिल्ली की तरफ जो रेलगाड़िया आ रही थी,उनमे हिन्दू इस प्रकार बैठे थे जैसे माल की बोरिया एक के ऊपर एक रची जाती हैं.अन्दर ज्यादातर मरे हुए ही थे,,गला कटे हुए.रेलगाड़ी के छप्पर पर बहुत से लोग बैठे हुए थे,,डिब्बों के अन्दर सिर्फ सांस लेने भर की जगह बाकी थी.बैलगाड़िया ट्रक्स हिन्दुओं से भरे हुए थे.रेलगाड़ियों पर लिखा हुआ था,," आज़ादी का तोहफा " रेलगाड़ी में जो लाशें भरी हुई थी उनकी हालत कुछ ऐसी थी की उनको उठाना मुश्किल था,,दिल्ली पुलिस को फावड़ें में उन लाशों को भरकर उठाना पड़ा. ट्रक में भरकर किसी निर्जन स्थान पर ले जाकर ,उनपर पेट्रोल के फवारे मारकर उन लाशों को जलाना पड़ा इतनी विकट हालत थी उन मृतदेहों की.भयानक बदबू......
सियालकोट से खबरे आ रही थी की वहां से हिन्दुओं को निकाला जा रहा हैं.उनके घर,उनकी खेती, पैसा-अडका, सोना-चाँदी,बर्तन सब मुसलमानों ने अपने कब्जे में ले लिए थे. मुस्लिम लीग ने सिवाय कपड़ों के कुछ भी ले जाने पर रोक लगा दी थी. किसी भी गाडी पर हल्ला करके हाथ को लगे उतनी महिलाओं-बच्चियों को भगाया गया.बलात्कार किये बिना एक भी हिन्दू स्त्री वहां से वापस नहीं आ सकती थी.बलात्कार किये बिना.....? जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आई वो अपनी वैद्यकीय जांच करवाने से डर रही थी.डॉक्टर ने पूछा क्यों ??? उन महिलाओं ने जवाब दिया,,हम आपको क्या बताये हमें क्या हुआ हैं ? हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं हमें भी पता नहीं हैं...उनके सारे शारीर पर चाकुओं के घाव थे. " आज़ादी का तोहफा" जिन स्थानों से लोगों ने जाने से मना कर दिया ,उन स्थानों पर हिन्दू स्त्रियों की यात्रा (धिंड) निकाली गयी. उनको बाज़ार सजाकर बोलियाँ लगायी गयी.
1947 के बाद दिल्ली में 400000 हिन्दू निर्वासित आये.और इन हिन्दुओं को जिस हाल में यहाँ आना पड़ा था,,उसके बावजूद पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने ही चाहिए ऐसा महात्मा जी का आग्रह था...क्योकि एक तिहाई भारत के तुकडे हुए हैं तो भारत के खजाने का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान
को मिलना चाहिए था.विधि मंडल ने विरोध किया,,पैसा नहीं देगे....और फिर बिरला भवन के
पटांगन में महात्मा जी अनशन पर बैठ गए.....पैसे दो,,नहीं तो मैं मर जाउगा....एक तरफ अपने मुहँ से ये कहने वाले महात्मा जी , की हिंसा उनको पसंद नहीं हैं,, दूसरी तरफ जो हिंसा कर रहे थे उनके लिए अनशन पर बैठ गए. दिल्ली में हिन्दू निर्वासितों के रहने की कोई व्यवस्था नहीं थी.इससे ज्यादा बुरी बात ये थी की दिल्ली में खाली पड़ी मस्जिदों में हिन्दुओं ने शरण ली तब बिरला भवन से महात्मा जी ने भाषण में कहा की दिल्ली पुलिस को मेरा आदेश हैं मस्जिद जैसी चीजों पर हिन्दुओं का कोई ताबा नहीं रहना चाहिए.निर्वासितों को बाहर निकालकर मस्जिदे खाली करे..क्यों कि महात्मा जी की दृष्टी में जान सिर्फ मुसलमानों में थी हिन्दुओं में नहीं...जनवरी की कडकडाती ठंडी में हिन्दू
महिलाओं और छोटे छोटे बच्चों को हाथ पकड़कर पुलिस ने मस्जिद के बाहर निकाला. गटर के किनारे
रहो लेकिन छत के निचे नहीं.क्योकि,,तुम हिन्दू हो.....4000000 हिन्दू भारत में आये थे,,ये सोचकर
की ये भारत हमारा हैं....ये सब निर्वासित गांधीजी से मिलाने बिरला भवन जाते थे तब गांधीजी माइक पर से कहते थे,,,क्यों आये यहाँ अपने घरदार बेचकर,,वहीँ पर अहिंसात्मक प्रतिकार करके
क्यों नहीं रहे ?? यही अपराध हुआ तुमसे अभी भी वही वापस जाओ..और ये महात्मा किस आशा पर पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने निकले थे ? सरदार पटेल ने कहा की ठीक हैं अगर भाई को इस्टेट में से हिस्सा देना पड़ता हैं तो कर्ज की रकम का हिस्सा भी चुकाना पड़ता हैं. गंदिजी ने कहा बराबर हैं...पटेल जी ने कहा,,"फिर दुसरे महायुद्ध के समय अपने देश ने 110 करोड़ रुपये कर्ज के रूप में खड़े किये थे,अब उसका एक तृतीय भाग पाकिस्तान को देने का कहिये,,आप तो बैरिस्टर हैं
आपको कायदा पता हैं. " गांधीजी ने कहा,,नहीं ये नहीं होगा

आज़ादी का सच

आजादी लेने के स्थान पर सत्ता-हस्तांतरण करवाना, माउण्टबेटन को आजाद भारत का गवर्नर जनरल बनाना, राष्ट्रमण्डल का सदस्य बने रहना, संविधान का 1935 के अधिनियम पर आधारित होना, ब्रिटिश राजा-रानी की तरह भारतीय राष्ट्रपति के पद को आडम्बरयुक्त बनाना, बहुसंख्य जनता का अशिक्षित-कुपोषित बने रहना, दलों में वंशवाद का हावी होना... जैसी बातें अपनी जगह सही हैं...
फिर भी, हमें “विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी” तो कम-से-कम मिली ही हुई है...
अतः- स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभ कामनायें...
हालाँकि इस आजादी पर भी कैंची चलनी शुरु हो गयी है. गूगल की अर्द्धवार्षिक पारदर्शिता रिपोर्ट के अनुसार जनवरी-जून 2010 के दौरान जहाँ भारत सरकार ने सामग्री हटाने के मात्र 30 आवेदन दिये थे, वहीं जनवरी-जून 2011 के दौरान 68 आवेदन दिये. दिल थामिये, ताजा रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई-दिसम्बर 2011 के दौरान भारत सरकार ने 101 आवेदन देकर 255 सामग्रियों को हटाने का अनुरोध किया है! 133 यूट्यूब विडियो पर पाबन्दी लगाने की माँग की गयी है; 26 वेब सर्च, 49 ब्लॉग पोस्ट को सेन्सर करने की माँग की गयी है. इनमें से कॉपीराईट का मामला 2 था, पोर्नोग्राफी का सिर्फ 1. बाकी सारे मामले “राजनैतिक टीका-टिप्पणियों” से जुड़े थे!
ध्यान रहे, जुलाई-दिसम्बर 2011 के दौरान भारत ने 2,207 उपयोगकर्ताओं की जानकारियाँ माँगी है, जिसमें से 66 फीसदी का गूगल ने अनुपालन किया है.
फेसबुक के मामले ऐसे आँकड़े अब तक तो अखबार में नहीं दीखे.
जो भी हो-
जयदीप शेखर603425_457464974285481_371495234_n

उर्दू अखबारों का दोगलापन

384593_429015820477463_1236366071_n मुंबई दंगो को लेकर उर्दू अखबारों का घोर दोगलापन उजागर
[साभार विस्फोट डॉट कॉम ]
उर्दू अख़बारों में मुंबई में भड़की हिंसा का मामला दूसरे दिन भी छाया रहा. जागरण ग्रुप का ‘इंकलाब’ अख़बार के संपादक (नॉर्थ) शकील शम्सी लिखते हैं कि “आज दुनिया भर में पुलिस एहतजाजी मुज़ाहरीन को मुंतशिर करने के लिए वाटरकैन और रबर बुलेट का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन हमारे मुल्क में अभी तक इस बात की ज़रूरत नहीं समझी गई है कि भीड़ को मुंतशिर करने के लिए रबर की गोलियां चलाई जाएं. बहुत से लोगों का कहना है कि पुलिस के ज़रिए गोली चलाए जाने से हालात ज़्यादा ख़राब हुए. सच क्या है, ये तो जांच के बाद ही सामने आएगा, लेकिन अफ़सोस कि दो नौजवानों की जान चली गई.”
‘हिन्दुस्तान एक्सप्रेस’ अपने संपादकीय में लिखता है कि “हम ये ज़रूर कह सकते हैं मुम्बई की पुलिस फायरिंग का ये वाक़्या जम्हूरियत के माथे पर एक कलंक का टीका ही है, जिसे मिटाना लाज़िमी है. ये इस वज़ह से ज़रूरी है, क्योंकि अगर हुकूमतें खामोश रहीं तो पुलिस का हौसला और बढ़ेगा और ये तास्सूर भी आम होगा कि सरकारी मिशनरी अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म ढ़ा रही है, जिस पर हुकूमत खामोश है!”
‘हमारा समाज’ अपने संपादकीय में लिखता है कि “सच्चाई ये है कि हिन्दुस्तान जैसे अज़ीम और सेकुलर मुल्क में हर रोज़ कहीं न कहीं अल्पसंख्यकों की जान व माल की हिफाज़त में कोताही हो रही है. लिहाज़ा हुकूमत को चाहिए कि इंसाफ करे.क्योंकि जिस मुल्क के अल्पसंख्यक इस मुल्क से खुश हो, जिस मुल्क में अल्पसंख्यकों को इंसाफ मिले, वो मुल्क दुनिया में अज़ीम कहलाते हैं. लेकिन हिन्दुस्तान में जम्हुरियत पर कब कौन सा लीडर डाका डाल दे, ये कहना बड़ा मुश्किल है. क्योंकि गुज़िश्ता रोज़ का का वाक़्या है कि एहतजाज करने वालों पर पुलिस ने बग़ैर वार्निंग के गोली चला दी, हालांकि वार्निंग देना बहुत ज़रूरी था, मगर ये मुसलमान थे जिनको वार्निंग कभी नहीं दी जाती, बल्कि इनका इस्तकबाल डायरेक्ट पुलिस की गोली करती है.”
226249_446010528755164_1374368691_n ‘राष्ट्रीय सहारा उर्दू’ अपने संपादकीय में लिखता है कि “मुसलमानों में इसलिए भी रंज व ग़म की लहर दौड़ी हुई है कि वज़ीरे-आज़म डॉ. मनमोहन सिंह अमेरिका के सिक्ख गुरूद्वारे में हमारे 6 सिक्ख भाई-बहनों के क़त्ल पर तो फोन उठाकर सदर बराक ओबामा से बात कर सकते हैं, लेकिन म्यांमार में मुसलमानों के कत्ले-आम पर वहां के सदर या वज़ीरे-आज़म सरज़िन्श नहीं कर सकते.”
‘सहाफ़त’ के संपादक हसन शुज़ा अपने विशेष संपादकीय में लिखते हैं कि “आज भी कई टीवी चैनल ये बता रहे 384633_401820073200859_758650620_n हैं कि 6 हज़ार बांग्लादेशी रोज़ मुल्क में दाख़िल हो रहे हैं. अगर ऐसा है तो इन लोगों को सरज़मीन-ए-हिन्द में दाख़िल होने से क्यों नहीं रोका जा रहा? सरहदों पर ज़बरदस्त पहरा है. सिर्फ एक दरियाई रास्ता है, वहां भी काफी फौज पुलिस तैनात रहती है. फिर इतना बांग्लादेशी आने की ख़बरें क्यों आ रही हैं? आसाम में क़त्ल, फ़सादात और इंसानी जान व माल के ज़यां से कहीं बेहतर ये होगा कि हस्बे क़ानून जो लोग बांग्लादेशी साबित हो जाएं, उन्हें वापस किया जाए. और लोगों को आने से रोका जाए, लेकिन जो ग़ैर-आसामी, ग़ैर-बोडो हिन्दू मुसलमान बंगाली हिन्दुस्तानी शहरी हैं, उनकी ज़िन्दगी दुश्वार न बनाई जाए. सरहदों पर सख्ती बरतना कोई बहुत बड़ा काम नहीं है, लेकिन ग़ैर-मुल्की के नाम पर आसाम में मुसलमानों को हरासां करना ग़लत है.”

सोमवार, 13 अगस्त 2012

पत्रकारिता का पतन

" आज़ादी के दौर में पत्रकारिता परवान चढी थी. "उद्दंड मार्तंड" और "सरस्वती" के दौर में एक विज्ञापन निकलता है --"आवश्यकता है सम्पादक की, वेतन /भत्ता - दो समय की रोटी -दाल, अंग्रेजों की जेल और मुकदमें" लाहौर का एक युवक आवेदन करता है और प्रख्यात पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी उसको सम्पादक नियुक्त करते हैं. सरदार भगत सिंह इस प्रकार अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत करते हैं. तब पत्रकारिता प्रवृत्ति थी अब वृत्ति यानी आजीविका का साधन हो गयी. पहले पत्रकारिता मिसन थी अब कमीनो का कमीसन हो गयी. भगत सिंह ने जब असेम्बली बम काण्ड किया तो अंग्रेजों को उनके विरुद्ध कोइ भारतीय गवाह नहीं मिल रहा था. तब दिल्ली के कनाटप्लेस पर फलों के जूस की धकेल लगाने वाले सरदार सोभा सिंह ने अंग्रेजों के पक्ष में भगत सिंह के विरुद्ध झूटी गवाही देकर भगत सिंह को फांसी दिलवाई और इस गद्दारी के बदले सरदार शोभा सिंह को अंग्रेजों ने पुरस्कृत करके " सर" की टाइटिल दी और कनाट प्लेस के बहुत बड़े भाग का पत्ता भी उसके हक़ में कर दिया. मशहूर पत्रकार खुशवंत सिंह इसी सरदार शोभा सिंह के पुत्र हैं. अब पत्रकारों को तय ही करना होगा कई वह पुरुष्कृतों के प्रवक्ता हैं या तिरष्कृतों के. यानी पत्रकारों की दो बिरादरी साफ़ हैं एक -- गणेश शंकर विद्यार्थी /भगत सिंह के विचार वंशज और दूसरे सरदार शोभा सिंह के विचार बीज. 2G की कुख्याति में हमने बरखा दत्त, वीर सिंघवी, प्रभु चावला और इनके तमाम विचार वंशज पत्रकारों को "दलाल" के आरोप से हलाल किया फिर भी पत्रकारिता के तमाम गुप चुप पाण्डेय अभी बचे हैं. विशेषकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया की मंडी की फ्राडिया राडिया रंडीयाँ और दलाल अभी भी सच से हलाल होना शेष हैं. "पेड न्यूज" और "मीडिया मेनेजमेंट" जैसे शब्द संबोधन वर्तमान मीडिया का चरित्र साफ़ कर देते हैं कि मीडिया का सच अब बिकाऊ है टिकाऊ नहीं. क्या है कोई संस्था जो पत्रकारों पर आय की ज्ञात श्रोतों से अधिक धन होने की विवेचना करे ? पहले सच मीडिया बताती थी और न्याय न्याय पालिका करती थी. मीडिया और न्याय पालिका ही दो हाथ थे जो रोते हुए जन -गन -मन के आंसू पोंछते थे. अब ये दोनों हाथ जनता के चीर हरण में लगे हैं. पत्रकारों से प्रश्न है --"सच" में तो सामर्थ्य है पर क्या वर्तमान में मीडिया सच की सारथी है या इतनी स्वार्थी है कि सच की अर्थी निकाल रही है." ---- राजीव चतुर्वेदी

रविवार, 12 अगस्त 2012

गोधरा काण्ड सच


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वैधानिक चेतावनी : ये पोस्ट आपका मानसिक संतुलन बिगाड़ सकती है इसलिये इस न पढ़ेँ इसे पढ़कर पागल होने वाले किसी भी ठलुये के प्रति मेरी की कोई जबावदेही नहीँ होगी !
गोधरा कांड कि इश सच्चाई को आग कि तरह फैलाव, ताकि सच्चाई सबतक पहुँच सके, क्या आप सचमुच में जानते हैं कि..... गुजरात दंगे का सच क्या है.....??????
यह सच हर हिंदू को पता होना चाहिए... एक बार इसे पढ़े जरुर.....
दरअसल ..... जहाँ देखो वहाँ ग
ुजरात के दंगो के बारे में ही सुनने और देखने को मिलता है... फिर चाहे वो गूगल हो या फेसबुक .. हो या फिर टीवी...! रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं.....रोज गुजरात की सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाता है...!

असल में.....सबका निशाना केवल एक नरेन्द्र भाई मोदी.....क्योंकि, वे हम हिन्दुओं के चहेते हैं... जिस कारण मुस्लिम तथा सेकुलर जी- जान से इस काम में जुटे हैं...! जिसे देखो... वो अपने को जज दिखाता है.... हर कोई सेकुलरता के नाम पर एक ही स्वर में गुजरात दंगो की भर्त्सना करते हैं.....
हालाँकि, मै भी दंगो को गलत मानता हूँ क्योंकि दंगे सिर्फ दर्द दे कर जाते हैं ...!
लेकिन...... सबसे बड़ा सवाल यह है कि.....गुजरात दंगा हुआ क्यों..........? 27 फरवरी २००२ को साबरमती ट्रेन के S6 बोगी को गोधरा रेलवे स्टेशन से करीब 826 मीटर की दुरी पर जला दिया गया था....जिसमे 57 मासूम, निहत्थे और निर्दोष हिन्दू कारसेवकों की मौत हो गयी थी... ! प्रथम द्रष्टा रहे वहाँ के 14 पुलिस के जवान जो उस समय स्टेशन पर मौजूद थे.. और उनमे से 3 पुलिस वाले घटना स्थल पर पहुंचे और साथ ही पहुंचे अग्नि शमन दल के एक जवान सुरेशगिरी गोसाई जी....! अगर हम इन चारो लोगों की मानें तो

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म्युनिसिपल काउंसिलर हाजी बिलाल" भीड़ को आदेश दे रहे थे.... ट्रेन के इंजन को जलाने का......! साथ ही साथ.... जब ये जवान आगबुझाने की कोशिश कर रहे थे..... तब भीड़ के द्वारा ट्रेन पर पत्थरबाजी चालू कर दी गई ......!
अब इसके आगे बढ़ कर देखें तो....
जब गोधरा पुलिस स्टेशन की टीम पहुंची तब 2 लोग 10 ,000 की भीड़ को उकसा रहे थे.... ये थे म्युनिसिपल प्रेसिडेंट मोहम्मद कलोटा और म्युनिसिपल काउंसिलर हाजी बिलाल.....!अब सवाल उठता है कि..... मोहम्मद कलोटा और हाजी बिलाल को किसने उकसाया और ये ट्रेन को जलाने क्यों गए......?????

सवालो के बाढ़ यही नहीं रुकते हैं..... बल्कि सवालो की लिस्ट अभी काफी लम्बी है......

अब सवाल उठता है कि .... क्यों मारा गया ऐसे राम भक्तो को......??? कुछ मीडिया ने बताया की ये मुसलमानों को उकसाने वाले नारे लगा रहे….अब क्या कोई बताएगा कि ..... क्या भगवान राम के भजन मुसलमानों को उकसाने वाले लगते हैं......?????

लेकिन इसके पहले भी एक हादसा हुआ 27 फ़रवरी 2002 को सुबह 7 .43 मिनट 4 घंटे की देरी से जैसे ही साबरमती ट्रेन चली और प्लेटफ़ॉर्म छोड़ा तो... प्लेटफ़ॉर्म से 100 मीटर की दुरी पर ही 1000 लोगो की भीड़ ने ट्रेन पर पत्थर चलाने चालूकर दिए .....! पर, यहाँ रेलवे की पुलिस ने भीड़ को तितर- बितर कर दिया और ट्रेन को आगे के लिए रवाना कर दिया.....!

लेकिन, जैसे ही ट्रेन मुश्किल से 800 मीटर चली...... अलग-अलग बोगियों से कई बार चेन खींची गई....! बाकी की कहानी जिस पर बीती उसकी जुबानी.......... उस समय मुश्किल से से15-16 की बच्ची की जुबानी......... ये बच्ची थी कक्षा 11 में पढने वाली गायत्री पंचाल जो कि उस समय अपने परिवार के साथ अयोध्या से लौट रही थी .... उसकी मानें तो... ट्रेन में राम धुनचल रहा था और ट्रेनजैसे ही गोधरा से आगे बढ़ी ..... एक दम से चेन खींच कर रोक दिया गया ...! उसके बाद देखने में आया कि ... एक भीड़ हथियारों से लैस हो कर ट्रेन की तरफ बढ़ रही है.....! हथियार भी कैसे....... लाठी- डंडा नहीं बल्कि.... तलवार, गुप्ती, भाले, पेट्रोल बम्ब, एसिड बम और पता नहीं क्या क्या.........! भीड़ को देख कर ट्रेन में सवार यात्रियों ने खिड़की और दरवाजे बंद कर लिए.......! पर भीड़ में से जो अन्दर घुस आए थे ...वो कार सेवको को मार रहे थे और उनके सामानों को लूट रहे थे और साथ ही बाहर खड़ी भीड़ मारो -काटो के नारे लगा रही थी....! एक लाउड स्पीकर जो कि पास के मस्जिद पर था.उससे बार बार ये आदेश दिया जा रहा था कि ..... मारो... काटो.. लादेन ना दुश्मनों ने मारो” ! इसके साथ ही.... साथ ही बहार खड़ी भीड़ ने पेट्रोल डाल कर आग लगाना चालू कर दिया... जिससे कोई जिन्दा ना बचे....! ट्रेन की बोगी में चारो तरफ पेट्रोल भरा हुआ था....! दरवाजे बाहर से बंद कर दिए गए थे , ताकि कोई बाहर ना निकल सके...! एस-6 और एस-7 के वैक्यूम पाइप काट दिए गए थे ...... ताकि ट्रेन आगे बढ़ ही नहीं सके......! जो लोग जलती ट्रेन से किसी प्रकार बाहर निकल भी गए तो.... उन्हें तेज हथियारों से काट दिया गया .... कुछ गहरे घाव की वजह से वहीँ मारे गए और कुछ बुरी तरह घायल हो गए....!

अब सवाल उठता है कि.... हिन्दुओं ने सुबह 8 बजे ही दंगा क्यों नहीं शुरू कर किया बल्कि हिन्दू उस दिन दोपहर तक शांत बना रहा (ये बात आज तक किसी को नहीं दिखी है)....????????

असल में..... हिन्दुओं ने जवाब देना तब चालू किया जब उनके घरों , गावों , मोहल्लो में वो जली और कटी फटी लाशें पहुंची......!

क्या ये लाशें हिन्दुओं को को मुसलमानों की तरफ से गिफ्ट थी जो हिन्दुओं को शांत बैठना चाहिए था .....

सेकुलर बन कर ???????

हिन्दू सड़क पर उतरे 27 फ़रवरी 2002 की दोपहर से.....! पुरे एक दिन हिन्दू शांति से घरो में बैठे रहे....| अगर वो दंगा हिन्दुओं ने या मोदी ने करना था तो 27 फ़रवरी 2002 की सुबह 8 बजे से ही क्यों नहीं चालू हुआ....???

मोदी ने 28 फ़रवरी 2002 की शाम को ही आर्मी को सडको पर लाने का आदेश दिया जो कि अगले ही दिन १ मार्च २००२ को हो गया और सडको पर आर्मी उतर आयी ..... गुजरात को जलने से बचाने के लिए....! पर भीड़ के आगे आर्मी भी कम पड़ रही थी तो १ मार्च २००२ को ही मोदी ने अपने पडोसी राज्यों से सुरक्षा कर्मियों की मांग करी...!

ये पडोसी राज्य थे महाराष्ट्र (कांग्रेस शासित- विलास राव देशमुख -मुख्य मंत्री), मध्य प्रदेश (कांग्रेस शासित- दिग्विजय सिंह -मुख्य मंत्री), राजस्थान (कांग्रेस शासित- अशोक गहलोत- मुख्य मंत्री) और पंजाब (कांग्रेस शासित- अमरिंदर सिंह मुख्य मंत्री) ...! क्या कभी किसी ने भी.......... इन माननीय मुख्यमंत्रियों से एक बार भी पुछा है कि ........ अपने सुरक्षाकर्मी क्यों नहीं भेजे गुजरात में जबकि गुजरात ने आपसे सहायता मांगी थी..........??????? या ये एक सोची समझी गूढ़ राजनितिक विद्वेष का परिचायक था.... इन प्रदेशो के मुख्यमंत्रियों का गुजरात को सुरक्षा कर्मियों का ना भेजना...????

उसी 1 मार्च 2002 को हमारे राष्ट्रीय मानवाधिकार (National Human Rights) वालो ने मोदी को अल्टीमेटम दिया ३ दिन में पुरे घटनाक्रम का रिपोर्ट पेश करने के लिए ...! लेकिन... कितने आश्चर्य की बात है कि... यही राष्ट्रीय मानवाधिकार वाले २७ फ़रवरी २००२ और २८ फ़रवरी २००२ को गायब रहे ..... इन मानवाधिकार वालो ने तो पहले दिन के ट्रेन के फूंके जाने पर ये रिपोर्ट भी नहीं माँगा कि क्या कदम उठाया गया गुजरात सरकार के द्वारा...!
एक ऐसे ही सबसे बड़े घटना क्रम में दिखाए गए या कहे तो बेचे गए........

गुलबर्ग सोसाइटीके जलने की.......

इस गुलबर्ग सोसाइटी ने पुरे मीडिया का ध्यान अपने तरफ खींच लिया | यहाँ एक पूर्व सांसद एहसान जाफरी साहब रहते थे......! इन महाशय का ना तो एक भी बयान था २७ फरवरी २००२ को और ना ही ये डरे थे उस समय तक.......! लेकिन...... जब २८ फरवरी २००२ की सुबह जब कुछ लोगो ने इनके घर को घेरा जिसमे कुछ तथाकथित मुसलमान भी छुपे हुए थे..... तो एहसान जाफरी जी ने भीड़ पर गोली चलवा दिया ........ अपने लोगो से जिसमे 2 हिन्दू मरे और 13 हिन्दू गंभीर रूप से घायल हो गए.....! जब इस घटनाक्रम के बाद इनके घर पर भीड़ बढ़ने लगी तो ये अपने यार-दोस्तों को फ़ोन करने लगे और तभी गैस सिलिंडर के फटने से कुल 42 लोगों की मौत हो गयी....! यहाँ शायद भीड़ के आने पर ही एहसान साहब को पुलिस को फ़ोन करना चाहिए था ना कि खुद के बन्दों के द्वारा गोली चलवाना चाहिए था....! पर इन्होने गोली चलाने के बाद फ़ोन किया डाइरेक्टर जेनेरल ऑफ़ पुलिस (DGP ) को......!

यहाँ एक और झूठ सामने आया..... जब अरुंधती रॉय जैसी लेखिका तक ने यहाँ तक लिख दिया कि ... एहसान जाफरी की बेटी को नंगा करके बलात्कार के बाद मारा गया और साथ ही एहसान जाफरी को भी.....!

लेकिन.....यहाँ एहसान जाफरी के बड़े बेटे ने ही पोल खोल दी कि .... जिस दिन उसके पिता की जान गई उस दिन उसकी बहन तो अमेरिका में थी और अभी भी रहती है.....! तो यहाँ.......... कौन किसको झूठे केस में फंसाना चाह रहा है ये साफ़ है....! अब यहाँ तक तो सही था..............पर............. गोधरा में साबरमती को कैसे इस दंगे से अलग किया जाता और हिन्दुओं को इसके लिए आरोपित किया जाता ...! इसके लिए लोग गोधरा के दंगे को ऐसे तो संभाल नहीं सकते थे ...अपने शब्दों से....

तो एक कहानी प्रकाश में आई.....! कहानी थी कि ....कारसेवक गोधरा स्टेशन पर चाय पीने उतरे और चाय देने वाला जो कि एक मुसलमान था उसको पैसे नहीं दिएजबकि गुजराती अपनी ईमानदारी के लिए ही जाने जाते हैं…! चलिए छोडिये ये धर्मान्धो की कहानी में कभी दिखेगा ही नहीं....

आगे बढ़ते हैं...|

अब कारसेवको ने पैसा तो दिया नहीं बल्कि मुसलमान की दाढ़ी खींच कर उसको मारने लगे तभी उस बूढ़े मुसलमान की बेटी जो की 16 साल की बताई गई वो आई तो कारसेवको ने उसको बोगी में खींच कर बोगी का दरवाजा अन्दर से बंद कर लिया ..! और इसीके के प्रतिफल में.......मुसलमानों ने ट्रेन में आग लगा दी और 58 लोगो को मार दिया..... जिन्दा जलाकर या काट कर.....!

अब अगर इस मनगढ़ंत कहानी को मान भी लें तो कई सवाल उठते हैं:-


क्या उस बूढ़े मुसलमान चाय वाले ने रेलवे पुलिस को इत्तिला किया...??????? रेलवे पुलिस उस ट्रेन को वहाँ से जाने नहीं देती या लड़की को उतार लिया जाता..... उस बूढ़े चाय वाले ने 27 फ़रवरी 2002 को कोई FIR क्यों नहीं दाखिल किया...????? 5 मिनट में ही सैकड़ो लीटर पेट्रोल और इतनी बड़ी भीड़ आखिर जुटी कैसे....???????? सुबह 8 बजे सैकड़ो लीटर पेट्रोल आखिर आया कहाँ से...................????????? एक भी केस 27 फ़रवरी २००२ की तारीख में मुसलमानों के द्वारा क्यों नहीं दाखिल हुआ..........??????? अब रेलवे पुलिस कि जांच में ये बात सामने आई कि ...... उस दिन गोधरा स्टेसन पर कोई ऐसी घटना हुई ही नहीं थी...! ना तो चाय वाले के साथ कोई झगडा हुआ था और ना ही किसी लड़की के साथ में कोई बदतमीजी या अपहरण की घटना हुई.....!
इसके बाद आयी नानावती रिपोर्ट में कहा गया है कि .... जमीअत-उलमा-इ-हिंद का हाथ था उन 58 लोगो के जलने में और ट्रेन के जलने में....! उससे भी बड़ी बात कि.....दंगे में 720 मुसलमान मरे तो 250 हिन्दू भी मरे.....! मुसलमानों के मरने का सभी शोक मनाते हैं........चाहे वो सेकुलर हिन्दू हो.... चाहे वो मुसलमान हो या चाहे वो राजनेता या मीडिया हो ! पर दंगे में 250 मरे हुए हिन्दुओं और साबरमती ट्रेन में मरे ५८ हिंदुवो को कोई नहीं पूछता है....कोई बात तक नहीं करता है ..! सभी को केवल मरे हुए मुसलमान ही दिखते हैं...!

एक और बात काबिले गौर है क्या किसी भी मुस्लिम लीडर का बयान आया था साबरमती ट्रेन के जलने पर....??????? क्या किसी मुस्लिम लीडर ने साबरमती ट्रेन को चिता बनाने के लिए खेद प्रकट किया.....?????????

इसीलिए सच को जानिए...... और जो भी गुजरात दंगे की बात करे अथवा नरेन्द्र मोदी के बारे में बोले....... उसे उसी की भाषा में जबाब दें....! गुजरात दंगा..... मुस्लिमों के द्वारा शुरू किया गया था..... और हम हिन्दुओं को उनसे इस बात का जबाब मांगना चाहिए..... और उन्हें जिम्मेदार ठहराना चाहिए....!

अथवा... क्या वे लाशें हिन्दुओं को को मुसलमानों की तरफ से गिफ्ट थी जो हिन्दुओं को शांत बैठना चाहिए था .....?????? जय महाकाल...!!! स्रोत: जय हिंद हिन्दू भारत का लेख...