सोमवार, 17 सितंबर 2012

सच तो आखिर सच है न ... गिरिजेश भोजपुरिया

नहीं, यह किसी मन्दिर में लिया गया चित्र नहीं है। यह दिल्ली के कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद से लिया गया है जिसे बनाने के लिये 27 हिन्दू और जैन मन्दिरों को तोड़ कर उनके मलबे का उपयोग किया गया। यहीं विदिशा की वेधशाला से उखाड़ कर लाया गया प्रसिद्ध मेहरौली लौह स्तम्भ स्थापित है। इसी के प्रांगण में कथित कुतुब मिनार है जो वस्तुत: खगोलीय प्रेक्षणों के लिये प्रयुक्त विष्णु स्तम्भ थी। फोटो 1872 में लिया गया।

 

 

 

 

 

देवस्थान मस्जिदें -1
जामा मस्जिद, भरूच (भृगुकच्छ), 1835

जमा मस्जिद करणावती देवस्थान मजिदें... ढाका

ख्वाजा जहां बीजापुर देवस्थान मस्जिदें - 4
ख्वाजाजहाँ, बीजापुर, 1885

करीमुद्दीन बीजापुर

देवस्थान मस्जिदें - 5
करीमुद्दीन, बीजापुर, 1885

देवस्थान मस्जिदें - 6
अढ़ाई दिन का झोपड़ा, अजमेर, 1870।
इस मन्दिर की बनावट और सुन्दरता के प्रभाव से मुहम्मद ग़ोरी इतना आतंकित हुआ कि तुरंत तोड़ कर मस्जिद में बदलने का हुक्म दिया ताकि वह बुतपरस्ती की एक अजीम निशानी मिटा सके और आगे कूच से पहले नमाज अदा कर सके। यह सम्भवत: पहला उदाहरण है जब इस काम के लिये समय तक तय कर दिया गया - जिस दिन पहुँचा उसका आधा दिन और आगे के दो दिन। ढाई दिनों में मन्दिर ध्वस

्त कर जैसे तैसे उसे मस्जिद में बदल दिया गया। ग़ोरी नमाज के बाद ही आगे बढ़ा। उसके साथ था तथाकथित उदार इस्लाम के सूफी रूप का एक ज़िहादी - मुइनुद्दीन चिश्ती जिसने विरोध में जुबान खोलना तो दूर, इस काम को समर्थन दिया और जिसकी अजमेर दरगाह पर जाने कितने हिन्दू मथ्था टेक चुके, टेक रहे हैं और टेकते रहेंगे।
हमेशा याद रखिये कि जो कब्र में लेटा हुआ है उसे क़यामत से पहले खुद खुदा तक मुक्ति नहीं दे सकता, वह दूसरों को क्या मुक्ति देगा? वह दूसरों की मुरादें क्या पूरी करेगा? :-

अढ़ाई दिन का झोपड़ा अजमेर

395234_4558749454980_243035463_nतथाकथित अंतिम मजहब का एकमात्र निराकार ईश्वर वास्तव में घर बारी था। अन्तिम दूत के पहले अरब समाज में उसकी तीन पुत्रियाँ पूजी जाती थीं - मनात या मना:, अल उज़्ज़ और अल लात।
दूत के आदेश पर जनवरी 630 में हमला कर मना: का मन्दिर तोड़ दिया गया, उसी वर्ष अक्टूबर में अल लात का और उसी साल के पवित्र महीने में दूत के साथियों ने अल उज़्ज़ का मन्दिर मिसमार कर दिया।
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यह तथ्य इसलिये शेयर किया गया है कि आप की जानकारी में रहे। बेकार की बहसों और ग़ाली गलौज से कुछ हासिल नहीं होता। अपना कोश और अध्ययन दुरुस्त कीजिये ताकि सभ्यता विरोधियों को समझ सकें और प्रतिरोध कर सकें।

अली भवानी खानदेश 1885

देवस्थान मस्जिदें - 7
अली भवानी, खानदेश, 1885
इस मन्दिर में वह शिलालेख भी है जिसमें ज्योतिर्विद भास्कराचार्य के सिद्धांत शिरोमणि के अध्ययन हेतु सोमदेव को दिये गये भूदान का उल्लेख है।

सोमनाथ प्रभास पाटण

देवस्थान मस्जिदें - 8
सोमनाथ, प्रभास पाटण, 1900 [अब मन्दिर पुनर्निर्मित]
इसे इस्लामी आक्रमणकारियों ने कुल सात बार तोड़ा और यह पुन: पुन: बनता रहा। भारतीय इतिहास में ऐसी फिरकापरस्ती का एक और उदाहरण है पुरी का जगन्नाथ मन्दिर जिसे कुल 18 बार आक्रमण झेलने पड़े!

अटाला देवी जौनपुर देवस्थान मस्जिदें - 9
अटाला देवी, जौनपुर

कुतुब मीनार क़ुतुब मीनार का सच ........
1191A.D.में मोहम्मद गौरी ने दिल्ली पर आक्रमण किया ,तराइन के मैदान में पृथ्वी राज चौहान के साथ युद्ध में गौरी बुरी तरह पराजित हुआ, 1192 में गौरी ने दुबारा आक्रमण में पृथ्वीराज को हरा दिया ,कुतुबुद्दीन, गौरी का सेनापति था 1206 में गौरी ने कुतुबुद्दीन को अपना नायब नियुक्त किया और जब 1206 A.D,में मोहम्मद गौरी की मृत्यु हुई tab वह गद्दी पर बैठा ,अनेक विरोधियों को समाप्त करने में उसे लाहौर में ही दो वर्ष लग गए I
1210 A.D. लाहौर में पोलो खेलते हुए घोड़े से गिरकर उसकी मौत हो गयी अब इतिहास के पन्नों में लिख दिया गया है कि कुतुबुद्दीन ने क़ुतुब मीनार ,कुवैतुल इस्लाम मस्जिद और अजमेर में अढाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद भी बनवाई I
अब कुछ प्रश्न .......
अब कुतुबुद्दीन ने क़ुतुब मीनार बनाई, लेकिन कब ?
क्या कुतुबुद्दीन ने अपने राज्य काल 1206 से 1210 मीनार का निर्माण करा सकता था ? जबकि पहले के दो वर्ष उसने लाहौर में विरोधियों को समाप्त करने में बिताये और 1210 में भी मरने
के पहले भी वह लाहौर में था ?......शायद नहीं I कुछ ने लिखा कि इसे 1193AD में बनाना शुरू किया
यह भी कि कुतुबुद्दीन ने सिर्फ एक ही मंजिल बनायीं उसके ऊपर तीन मंजिलें उसके परवर्ती बादशाह इल्तुतमिश ने बनाई और उसके ऊपर कि शेष मंजिलें बाद में बनी I यदि 1193 में कुतुबुद्दीन ने मीनार बनवाना शुरू किया होता तो उसका नाम बादशाह गौरी के नाम पर "गौरी मीनार "या ऐसा ही कुछ होता न कि सेनापति कुतुबुद्दीन के नाम पर क़ुतुब मीनार I उसने लिखवाया कि उस परिसर में बने 27 मंदिरों को गिरा कर उनके मलबे से मीनार बनवाई ,अब क्या किसी भवन के मलबे से कोई क़ुतुब मीनार जैसा उत्कृष्ट कलापूर्ण भवन बनाया जा
सकता है जिसका हर पत्थर स्थानानुसार अलग अलग नाप का पूर्व निर्धारित होता है ? कुछ लोगो ने लिखा कि नमाज़ समय अजान देने के लिए यह मीनार बनी पर क्या उतनी ऊंचाई से किसी कि आवाज़ निचे तक आ भी सकती है ?
उपरोक्त सभी बातें झूठ का पुलिंदा लगती है इनमें कुछ भी तर्क की कसौटी पर सच्चा नहीं lagta सच तो यह है की जिस स्थान में क़ुतुब परिसर है वह मेहरौली कहा जाता है, मेहरौली वराहमिहिर के नाम पर बसाया गया था जो सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक , और खगोलशास्त्री थे उन्होंने इस परिसर में मीनार यानि स्तम्भ के चारों ओर नक्षत्रों के अध्ययन के लिए २७ कलापूर्ण परिपथों का निर्माण करवाया था I
इन परिपथों के स्तंभों पर सूक्ष्म कारीगरी के साथ देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी उकेरी गयीं थीं जो नष्ट किये जाने के बाद भी कहीं कहींदिख जाती हैं I
कुछ संस्कृत भाषा के अंश दीवारों और बीथिकाओं के स्तंभों पर उकेरे हुए मिल जायेंगे जो मिटाए गए होने के बावजूद पढ़े जा सकते हैं I मीनार , चारों ओर के निर्माण का ही भाग लगता है ,अलग से बनवाया हुआ नहीं लगता, इसमे मूल रूप में सात मंजिलें थीं सातवीं मंजिल पर " ब्रम्हा जी की हाथ में वेद लिए हुए "मूर्ति थी जो तोड़ डाली गयीं थी ,छठी मंजिल पर विष्णु जी की मूर्ति के साथ कुछ निर्माण थे we भी हटा दिए गए होंगे ,अब केवल पाँच मंजिलें ही शेष है इसका नाम विष्णु ध्वज /विष्णु स्तम्भ या ध्रुव स्तम्भ प्रचलन में थे ,
इन सब का सबसे बड़ा प्रमाण उसी परिसर में खड़ा लौह स्तम्भ है जिस पर खुदा हुआ ब्राम्ही भाषा का लेख जिसे झुठलाया नहीं जा सकता ,लिखा है की यह स्तम्भ जिसे गरुड़ ध्वज कहा गया है
,सम्राट चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य (राज्य काल 380-414 ईसवीं) द्वारा स्थापित किया गया था और यह लौह स्तम्भ आज भी विज्ञानं के लिए आश्चर्य की बात है कि आज तक इसमें जंग नहीं लगा .उसी महानसम्राट के दरबार में महान गणितज्ञ आर्य भट्ट,खगोल शास्त्री एवं भवन निर्माण
विशेषज्ञ वराह मिहिर ,वैद्य राज ब्रम्हगुप्त आदि हुए
ऐसे राजा के राज्य काल को जिसमे लौह स्तम्भ स्थापित हुआ तो क्या जंगल में अकेला स्तम्भ बना होगा निश्चय ही आसपास अन्य निर्माण हुए होंगे जिसमे एक भगवन विष्णु का मंदिर था उसी मंदिर के पार्श्व में विशालस्तम्भ वि ष्णुध्वज जिसमे सत्ताईस झरोखे जो सत्ताईस नक्षत्रो व खगोलीय अध्ययन के लिए बनाए गए निश्चय ही वराह मिहिर के निर्देशन में बनाये गए
इस प्रकार कुतब मीनार के निर्माण का श्रेय सम्राट चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य के राज्य कल में खगोल शाष्त्री वराहमिहिर को जाता है I
कुतुबुद्दीन ने सिर्फ इतना किया कि भगवान विष्णु के मंदिर को विध्वंस किया उसे कुवातुल इस्लाम मस्जिद कह दिया ,विष्णु ध्वज (स्तम्भ ) के हिन्दू संकेतों को छुपाकर उन पर
अरबी के शब्द लिखा दिए और क़ुतुब मीनार बन गया...

 

......गिरिजेश भोजपुरिया

1 टिप्पणी:

  1. श्री गिरिजेश भोजपुरियाजी नमस्ते !
    जोरदार तरीकेसे आपने यह लिखा फोटो दि और इंफर्मेशन दि है | आपकी जीतनी तारीफ़ की जय वह कम है | धन्यवाद और मेरा नतमस्तक प्रणाम आपश्री को !!!

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